आज के आधुनिक युग में मै ये नहीं समझ पा रहा हूँ कि कोई किसी के ऊपर किस हद तक अपनी बात को थोप सकता है वो भी तब जब सोशल मीडिया का युग अपने युवा अवस्था में हो ,तब ऐसी किसी भी प्रकार की कोई सोच कारगर नहीं हो सकती। जो लोग धरा ३७७ के समर्थन में है उनकी भी तो कोई सोच और समझ होगी,तो क्या हमारा समाज,हमारा संविधान उन लोगों की बात को अनसुना कर कर केवल अपनी बात को मनवाने का प्रयास कर रहा है।
कुछ लोग तो यहां तक कह रहे है की इस से हमारी धार्मिक भावना आहत हो सकती है परन्तु उनकी भावनाएं कैसे आहत होगी वो बता नहीं पा रहे है,दोस्तों यह दौर एक नया दौर है इस दौर में किसी को रोक कर या बांधकर नहीं रखा जा सकता है,युवा अपनी युवा सोच के वजह से नित रोज नए आयाम गढ़ रहे है,धारा ३७७ को ले कर बेफिजूल की बातों का कोई औचित्य नहीं है और हमें समाज के हर तबके को साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
कुछ लोग तो यहां तक कह रहे है की इस से हमारी धार्मिक भावना आहत हो सकती है परन्तु उनकी भावनाएं कैसे आहत होगी वो बता नहीं पा रहे है,दोस्तों यह दौर एक नया दौर है इस दौर में किसी को रोक कर या बांधकर नहीं रखा जा सकता है,युवा अपनी युवा सोच के वजह से नित रोज नए आयाम गढ़ रहे है,धारा ३७७ को ले कर बेफिजूल की बातों का कोई औचित्य नहीं है और हमें समाज के हर तबके को साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
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