Thursday, January 20, 2022

कलयुग में दो राम

जैसा कि मैंने जो शीर्षक रखा है "कलयुग में दो राम" उससे आप सभी पाठक मित्रों को लेखनी के विषय का अन्दाज लग हीं गया होगा। हां। मैं उन्हीं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जी की बात कर रहा हूं। त्रेता युग में तो केवल मर्यादा पुरुषोत्तम राम हुआ करते थे। जो अयोध्या के राजा महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में इस पवित्र भूमि पर अवतरित हुए थे। लेकिन कलयुग में उन्हें दो राम में बांट दिया गया है। एक वो राम जो सौम्य, साहसी, वीर, आज्ञाकारी शिष्य, आज्ञाकारी पुत्र, न्यायप्रिय राजा, सर्वोत्तम भाई और आदर्श पति थे। वो भगवान राम अपने पिता महाराजा दशरथ जी के वचन की रक्षा हेतु अपनी सौतेली मां महारानी कैकेई के कहने पर सब सुख वैभव का परित्याग कर के वन गमन कर गए। उन्होंने पलटकर मां से अपना कसूर भी नहीं पूछा। बल्कि अपने अनुयायियों और सगे-संबंधियों को यही समझाते रहे कि मां के आदेश का पालन हर पुत्र को हर हाल में करना चाहिए।
भगवान श्री राम जी को इस कलयुग ने दो राम के बीच में बांटकर रख दिया है। एक वो आज्ञाकारी राम और कलयुग के पराक्रमी राम। जिन्हें अयोध्या के राजा नाम से जानते हैं। उनका नाम आजकल पिछले तीन दशकों से चुनाव जीतने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। एक वो राम जो सर्वोच्च मानदंड स्थापित कर चुके हैं। अब उनको राजनीति में उपयोग करके सही नहीं किया जा रहा है। आजकल एक विशेष पार्टी के प्रचार में ये देखा-सुना जा सकता है कि "जो राम कै लाए हैं, हम उनको लाएंगे"। क्या इस तरह की बेवकूफी भरी बातें करके हम अपने देवता को अपमानित करने का पाप नहीं कर रहे हैं। अरे हमारी कोई औकात है कि हम अपने माता-पिता को ला सकते हैं, नहीं हमारे माता-पिता हमें ला सकते हैं। अर्थात हमारे भगवान राम ने हम सबको पैदा किया है। हम सबको लेकर इस सृष्टि पर आए हैं। ऐसे घटिया बोल बोलने वाले लोग हमारे राम को अपने फायदे के लिए बदनाम नहीं कर सकते। 
एक राम हैं हमारे सनातन धर्म के ध्वजवाहक और कलयुग के दूसरे राम हैं संघ, विश्व हिन्दू परिषद और उनके वैचारिक सहयोगियों के। हमारे राम तो घट-घट में बसने वाले हैं और उनके राम चुनावी बातों में। मैं समाज के हर तबके के लोगों से हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि हमारे भगवान राम को सौम्य, साहसी और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में हीं रहने दें। उन्हें अलग-अलग उद्देश्यों से बांटना बंद होना चाहिए। अयोध्या क्या देश के हर कण में समा श्रीराम जी के विद्यमान होने का सबको अहसास कराएं एवं उनके आदर्शों पर चलने के लिए लोगों को जागरूक करना चाहिए।

Tuesday, January 11, 2022

बीजेपी के स्वामी प्रसाद मौर्य बने बागी

उत्तर प्रदेश बीजेपी में आचार संहिता लागू होते हीं भगदड़ मच गयी. आज पूर्वांचल के विधायक और योगी सरकार में श्रम मंत्री श्री स्वामी प्रसाद मौर्या और उनके साथी विदायक बाँदा जिले की तिंदवारी विधानसभा सीट से ब्रजेश प्रजापति, शाहजहांपुर की तिलहर सीट से रोशन लाल वर्मा और कानपुर के बिल्हौर सीट से विधायक भगवती सागर भगवा कुनबा छोड़कर साईकिल पर सवार हो गए हैं. ये दोपहर के बाद की आज की सबसे बड़ी खबर है. कल हीं विभिन्न चैनलों पर चुनावी सर्वे लाईव किया था. जिसमें भगवा पार्टी की सरकार बनते हुए दिखाया जा रहा था. वो सर्वे ठंडा भी नहीं पड़ा था कि पूस की ठंड में आज स्वामी प्रसाद मौर्या ने पार्टी छोड़कर पूर्वांचल के माहौल को गरमा दिया है. गौर करने वाली बात ये है कि चुनावी नजर में नजर आने वाले सारे महारथी अपनी कर्मभूमि पूर्वांचल की भूमि को हीं बना रखें हैं. जिनमें हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी जी वाराणसी (काशी), श्री योगी जी (गोरखपुर), सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव (आजमगढ़), उत्तर प्रदेश के एक उप मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्या (फूलपुर, इलाहबाद), कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गांधी, श्रीमती प्रियंका गांधी (रायबरेली, अमेठी) प्रमुख सियासी चेहरे हैं. जो पूर्वांचल को अपनी राजनैतिक उपजाऊ जमीन बनाये हुए हैं.


स्वामी प्रसाद मौर्य बीजेपी में आने से पहले बीएसपी में रहे और २०१७ में बसपा छोड़ बीजेपी से जुड़े थे. स्वामी जी एक वरिष्ठ नेता हैं और ५ बार के विधायक रहे. वर्तमान सरकार समेत पिछली सरकारों में भी मंत्री रहे हैं. मौर्या जी बेटी श्री संघमित्रा मौर्या भी बीजेपी से सांसद है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौर्या जी का राजनैतिक रसूख कितना बड़ा है. एक तरह से कहें तो सपा प्रमुख श्री अखिलेश यादव पूर्वांचल को अच्छे तरिके से साध लिया है. जो प्रदेश में परिवर्तन की खबर को पुख्ता कर रही है. आगे स्वामी प्रसाद मौर्या अपने साथियों के साथ मिलकर बीजेपी को और कितना नुकसान पहुंचाते हैं ? यह देखना दिलचप होने वाला है. लेकिन इतना तो तय है कि मौर्या ने बीजेपी की किल्ली हिला चुके हैं. अब पूर्वांचल में एक बार फिर अगड़े-पिछड़े की राजनितिक लड़ाई बड़े जोर-शोर से उठेगी. स्वामी प्रसाद मौर्या अपने को पिछड़ों और वंचितों का नेता के रूप में अपने आप को प्रचारित करेंगे. पहले भी इनकी पहचान पिछड़ों के एक बड़े नेता के रूप में रही है. अब सपा को ये कितना फायदा पहुंचा सकते हैं ? इसका आंकलन भविष्य में जरूर किया जाएगा. 

जमीन पर घट रहे घटनाओं पर नजर डाले तो प्रचण्ड बहुमत के घमंड ने बीजेपी को डूबा दिया. बीजेपी अपने निचे की जमीन को देखने की कोशिश नहीं की या यूं कहें कि बीजेपी अपने पैर को देखना को देखना मुनासिब नहीं समझा. अहंकार में बस आँखों के बराबर हीं देखना जरूरी समझा. इतना बड़ा मंत्री और उसके समर्थक विधायक पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और बीजेपी शीर्ष नेतृत्व महज मूक दर्शक बना रहता है. ये अहंकार की बानगी है. इस एक नासमझी के कारण बीजेपी चुनाव में अब धीरे-धीरे निचे की तरफ खिसकते जा रही है. खासकर पूर्वांचल का क्षेत्र हमेशा जातियों में बंटकर वोट करता है. जिसका बीजेपी ने २०१७ विधानसभा और २०१९ लोकसभा चुनाव में बहुत अच्छे से उपयोग किया था. लेकिन समय मामला थोड़ा उलटा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है. इस क्षेत्र के ओम प्रकाश राजभर जो अपनी जाति पर बढ़िया पकड़ रखते हैं. वो बीजेपी का साथ छोड़ अखिलेश के साथ जुड़ चुके हैं. निश्चित तौर पर बीजेपी अब नुकसान में रहने वाली है. जमीन का मुद्दा रोजगार, आवारा पशुओं से निजात, भय मुक्त शासन, महिलाओ का सम्मान, कृषि उपज की बेहतर कीमत, महँगाई इत्यादि है न कि धर्म. जनता अब अपने हक के लिए सरकार से सवाल पूछना शुरू कर दिया है.

Saturday, January 8, 2022

U P समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की हुई घोषणा

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव की घोषणा आज चुनाव आयोग ने तीन बजे तिथि व चरणवार घोषित कर दिया। अबकी बार यह चुनाव बहुत अलग होने जा रहा है। कोरोना की बढ़ती रफ्तार को मद्देनजर रखते हुए आयोग ने १५ जनवरी तक रोड शो, मेगा शो, रथ यात्रा एवं पब्लिक रैली पर रोक लगा दिया है तथा विधानसभा वार चुनावी खर्च को भी बढ़ा दिया है। यह चुनाव बहुत हद तक सोशल मीडिया पर आधारित होगा। यहां जिसके पास जितना पैसा होगा, जितने व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के छात्र एवं अध्यापक होंगे उसकी बात जमीन तक बहुत जल्दी पहुंच पाएगी। इसलिए इस चुनाव में बहुत नयापन दिखने वाला है। 
जिन पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हुई है उसमें पंजाब को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में भाजपा की सरकार है। जिसको बीजेपी के छोटे-बड़े नेता डबल इंजन की सरकार कहकर संबोधित करते हैं। उन‌ राज्यों में फैले अब्यवस्थाओं का असर बस बस जुमलों से  खत्म नहीं होने वाला बल्कि फजीहत भी कराने वाला होगा। सारी राज्य सरकारों पर जनता का गुस्सा भी देखने को मिलेगा। डबल इंजन की सरकारों को तो केन्द्र और राज्य सरकार का भी हिसाब जनता मांगेगी।
मैं उत्तर प्रदेश से हूं और मैं अपने प्रदेश की बात करूंगा। जो मैंने अपनी आंखों से देखा है। उत्तर प्रदेश कोरोना में हुई सरकारिया बदइंतजामी को नहीं भूलेगा। कोरोना में करोड़ों प्रदेश वासी जो अपने घरों से बाहर अन्य प्रदेशों में फंसे थे। वे सब किन कठिनाइयों का सामना करके दो हफ्ते में पैदल, साईकिल से भूखे-प्यासे वापस लौटे। उन्हें वो दर्द आज भी याद है। उसके बाद की बदली परिस्थितियों में बढ़ती हुई महंगाई और ११० रूपया लीटर पेट्रोल, १८३ रूपया किलो सरसो का तेल, इलाहाबाद संगम पर दफनाई गई लाशें, मोक्षदायिनी गंगा में तैरते शव, ८९६ रूपया गैस सिलेंडर को कैसे भूल सकता है ? और तो और पेपर लीक बिना कोई परीक्षा पूर्ण न हो पाना ये सब तो राज्य के युवाओं के जेहन में घर बना कर बैठा है। अब तो हिसाब लोकतांत्रिक तरीके से लिया हीं जाएगा। 

Saturday, January 1, 2022

नया साल का चुनाव और कोरोना का साथ

पुराने भयावह साल के बीतने की ख़ुशी अभी मनाना सही नहीं है ओमीक्रान के रूप में देश के सामने एक नई चुनौती हमारे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए उनके सामने आ खड़ी हुई है. क्योंकि पुराने साल की विदाई कोरोना की ज्यादती के साथ हुआ तो नए साल का दस्तक कोरोना के तीसरे रूप ओमीक्रान के रूप में हुआ. आज उत्तर भारत के अधिकाँश प्रदेशों में ओमीक्रान दस्तकंदे चुका है. अभी तो शुरुआत में ओमीक्रान से ग्रसित लोगों की संख्या कम जरूर है लेकिन आने वाले दिनों में ये बढ़ने वाला है. ऐसा कुछ अनुमान वरिष्ठ चिकित्स्क लगा रहें हैं.
ओमीक्रान के साथ-साथ चीन भी हमारे देश के लिए एक नई चुनौती बन कर आया हुआ है. 1962 के बाद चीन एक बार फिर आक्रामक रूप अख्तियार किया हुआ है. पिछले साल के पहले महीने में हीं चीन ने गलवान घाटी में घुसने का दुस्साहस किया था और हमारे वीर सैनिकों के ऊपर कायराना हमला किया था. जिसमें कुछ मान भारती के सुपूत शहीद भी हो गए थे. इस नए साल में देश और भी कई चुनौतियों से जूझेगा, जिसमें महंगाई, बेरोजगारी और किसानी प्रमुख होंगे.
सरकार को अब संवेदनशील होकर जनता की आवाज को सुनने की कोशिश करना होगा। बीते हुए साल में साल में हमने देखा कि कैसे सरकार के हठ के कारण हमारे किसानों को एक साल से ज्यादा वक्त तक अपना घर-खेत छोड़कर दिल्ली की सड़कों पर बैठा पड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि राजनैतिक नुकसान को देखते हुए दिल्ली की केंद्र सरकार को आखिरकार अपना कृषि बिल वापस लेना पड़ा था. इस नए साल में इस तरह के किसी भी हठ से बचने का प्रयास सरकार को करना चाहिए.