आज मोदी जी कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान से "आसोल परिवर्तन" रैली किया। जहां से तमाम तरिके के राजनीतिक बाण छोड़े। बंगाल के हित की बात की। रामराज्य की बात की। कोलकाता हमेशा से ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। चाहे आजादी के पहले की बात हो या आजादी के बाद की। आजादी के बाद जब सारा देश चकाचौंध में डूबा हुआ था और नेहरू जी के भाषण को सुनने को बेताब था। उस वक्त भी कलकत्ता अंधेरे में डूबा हुआ था। ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान जहां से आज मोदी जी रैली को संबोधित कर रहे थे। उससे महज़ 11 किलोमीटर दूर "बेलिया घाट" नामक स्थान है। जहां पर हैदरी नामक एक एक मस्जिद हुआ करती थी। जब देश खुशियां मना रहा था। उस वक्त भी कलकत्ता शहर अन्धेरे से पटा था और उसी रात हैदरी मस्जिद में बापू जी दिल्ली की चकाचौंध से दूर अमन-चैन की बात कर रहे थे। अब उस मस्जिद का नाम "गांधी भवन" है। बात ये है कि कलकत्ता ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है, मुफलिसी से लेकर अमीरी तक।
कुछ विदेशी विद्वानों के कलकत्ता के सन्दर्भ में विचार निचे मैं कोट कर रहा हूं-
चर्चिल- चर्चिल जब भारत से अपने देश लंदन वापस आते तो अपनी से बोले "कलकत्ता एक अजीब शहर है। वहां की ठण्डी हवा और सुरमयी धुन्ध लंदन जैसा दिखाई देता है।"
ब्रिटिश रिपोर्टर सर ड्रेवलेन ने 1863 में कहा था कि "कोलकाता से ज्यादा उदासीन बस्ती दुनियां के चारों दिशाओं में नहीं है।"
रावर्ड क्लाइड ने कहा था कि "कोलकाता कायनात की सबसे बुरी बस्ती है। ऐसी बस्ती पुरी दुनिया में नहीं है।"
विलियम हंटर मोहब्बतनामा में लिखते हुए अपनी मंगेतर से कहते हैं कि "तसब्बुर करो उन तमाम चीजों का जो फितरत में सबसे शानदार है और उनके साथ-2 उन तमाम अनासीर जो तामिर के फन में सबसे ज्यादा हसीन होते हैं। जैसे हीं याद करोगी तुम्हें कलकत्ता शहर की रूह का अहसास हो जायेगा कि ये शहर क्या है। (हिन्दी अनुवाद)
चलिए ये बात हुई उन लोगों की जिन लोगों ने कलकत्ता को अपने-अपने तरिके से समझा था। बात इतिहास की करते हैं जब 1967 में 14 पार्टियों ने सामूहिक रूप से ब्रिगेड मैदान में रैली की थी। जिसमें किसान, मजदूर और मजलूमों की बात हुई थी। जो इस बार मोदी जी के भाषण से नदारद रही। और हो भी क्यों नहीं बीजेपी/संघ अपने साथ साल के कार्यकाल में शायद दो या तीन बार सरकार के सामने इतना बड़ा संकट आया हो। जो किसान आन्दोलन प्रधानमंत्री जी के आवास से महज कुछ मील दूरी पर बैठे हैं। अगर आसोल परिवर्तन रैली में किसानों की बात मंच से की जाती तो सरकार खुद फंसती।
वैसे सारी सरकारें चयनित तौर पर अपनी उपलब्धियों का बखान तो करती हैं और उन मुद्दों को गौड़ करने की कोशिश करती हैं जिससे उन्हें फजीहत ना झेलनी पड़े। कांग्रेस ने पूर्व में एक दशक, वाम दल तीन दशक (जो यह चुनाव एक साथ मिलकर लड़ रही हैं) और ममता की पार्टी भी एक दशक से सत्ता पर काबिज है। लेकिन फिर भी कलकत्ता आज उन्हीं मूलभूत सुविधाओं के लिए लड़ाई लड़ रहा है। बंगाल चुनाव मोदी जी, संघ और भाजपा के लिए नाक की लड़ाई का सवाल बन चुका है। क्योंकि जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ/बीजेपी अपना पूज्य पुरुष मानती है वो बंगाल से आते थे। जिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी को संघ-बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करती आई है उनके नाम के सहारे भी बीजेपी अब तक बंगाल की सत्ता में नहीं आ सकी है। अगर बीजेपी हारती है तो आने वाले दो दशकों तक बंगाल में कोई करिश्मा नहीं कर पायेगी।
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