Thursday, December 31, 2020

2020 की महत्वपूर्ण झलकियां

आज बीतने जा रहा साल 2020 अपने आप में अनेक घटनाओं को समेटे हुए था। जो हमारे देश के साथ हीं साथ पूरे विश्व जगत के लिए कष्टकारी सिद्ध हुआ। आज मैं उन्हीं कुछ अहम घटनाओं का अपने विवेकानुसार जिक्र करूंगा।

कोरोना का भारत आगमन - कोरोना जो आज तक नहीं गया और समाज के लिए नासूर बना हुआ है। उसका आगमन केरल में सबसे पहले जनवरी महीने में हीं हो चुका था। तब तक पूरा चीन, अमेरिका और यूरोप इस लाईलाज बिमारी की बहुत बुरी गिरफ्त में पहुंच चुका था। राहुल गांधी ने जनवरी महीने में हीं सरकार से कोरोना के प्रभाव पर अपनी चिंता जाहिर की थी। जिसे सरकार समेत केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जी द्वारा राहुल गांधी का पूर्व की भांति उपहास उड़ाते हुए खारिज कर दिया। सरकार की उस गलती का परिणाम ये रहा कि करोड़ों लोगों ने रोजगार गवां दिये और हिन्दुस्तान के इतिहास में जीडीपी ने रिकार्ड 23 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की। कोरोना आज तक लाईलाज बीमारी बनी हुई है। कोरोना के गिरफ्त में करोड़ों देशवासी आये और डेढ़ लाख से ज्यादा ने अपने जान गवाएं‌। सरकार की लापरवाही का नतीजा हमें अपनी-अपनी नौकरियों को खोकर चुकाना पड़ा।

एम पी में सिंधिया की कांग्रेस से गद्दारी और भाजपा की सवारी - फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में हीं महज 15 महीने बाद कांग्रेस नीत कमलनाथ की सरकार को हटाने की पटकथा केन्द्र के इशारे पर सिंधिया ने लिख दी थी। सिंधिया ने सरकार में शामिल अपने 22 समर्थक विधायकों को भाजपा शासित कर्नाटक के होटल में भेज दिया। काफी कश्मकश के बाद सिंधिया ने अपने समर्थकों का विधानसभा से इस्तीफा करवा कर बीजेपी को बहुमत प्राप्त करना दिया और खुद भी भाजपाई बन गये और भाजपा से राज्यसभा सांसद बने। सिंधिया की गद्दारी साल की सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाओं में से एक है।

लाकडाउन का पहली बार इस्तेमाल - मार्च के महीने में जैसे हीं जोड़-तोड़ कर मध्य प्रदेश में सिन्धिया की गद्दारी से बीजेपी ने अपनी सरकार का गठन किया। ठीक उसी के दो-तीन दिन बाद केन्द्र सरकार ने 22 मार्च को एक दिन के लाकडाउन की घोषणा किया। वह लाकडाउन ऐसा था जब सामान्य सरकारी आदेश से रेल, मेल, बस, ट्रक, स्कूटर, साईकिल, प्लेन यहां तक कि पैदल आवागमन भी बन्द कर दिया गया था। जहां पर इंसानों के ऊपर पुलिस का पहरा बिठा दिया गया था। एक-एक करके सम्पूर्ण लाकडाउन को ४५ दिनों तक बढ़ा दिया गया. जिस दौरान देश के सारी गतिविधियां मानों  सिमट कर के हीं रह गयी हों. इस दौरान खुशी और मातम मनाने पर भी सरकार का पहरा था. 

ताली-थाली बजाकर कोरोना भगाने का बेहूदा ज्ञान और प्रचार - सम्पूर्ण लाकडाउन लगनेे और कोरोना वाायरस के विकराल रूप धारण करने के बाद सरकार खासकर प्रधानमंत्री जी ने देश को सम्बोधित करते हुए कहा कि ताली-थाली बजाइये। जिससे की जनसेवा में लगे हमारे भाई-बहनों का उत्साहवर्धन हो सके. प्रधानमत्री जी के इस कथन को देश की जनता ने ब्रम्ह वाक्य की तरह लिए. और पूरा देश मिलकर  खूब ताली-थाली बजाया। प्रधानमंत्री जी के इस  कथन के बाद बीजेपी का बगलबच्चा संगठन के पधाकारियों और भक्तों ने इसे मोदी जी का कोरोना भगाने का मंत्र कह कर गांव और कस्बों में खूब प्रचारित किया। लेकिन कोरोना और बिकराल से धारण कर लिया।  

समस्त देश से श्रमिकों का अपने-अपने गृह राज्यों को पलायन - इस दौरान देश को एक अभूतपूर्व तस्वीर को देस्खना पड़ा. जो अत्यंत पीड़ादायक था. १५ दिन के लकडाउन का पहला चरण समाप्त होने तक देश के नागरिकों में एक दृढ विश्वास था कि  मोदी जी कुछ चमत्कार जरूर करेंगे और सब चंगा हो जायगा। उसके बाद हमारी जिंदगी फिर से आम हो जायेगी। हमारी दिनचर्या पूर्व की भाँति फिर से पटरी पर लौट आएगी। लेकिन जैसे हीं मोदी जी ८ बजे सायं को टीवी पर अवतरित हुए और घोषणा किये कि दो हफ्ते के लिए आपको और अपने घरों में कैद रहना पड़ेगा। मानों तब भक्तों और नागरिकों का सब्र जबाब देने लगा. उस स्थिति में देश के विभिन्न शहरों से बहुत बड़ी मात्रा में पलायन शुरू हो गया. क्या दिल्ली, क्या पंजाब, क्या मुंबई, क्या बंगलौर। सब जगह से श्रमिक अपने-अपने घरों को पलायन कर लिए.

इस दरम्यान सबसे दुःख की बात ये रही कि परिवहन के सरे साधन बस, रेल, हवाई सेवा, ऑटो सब बंद थे. तो लोग पैदल हीं सड़कों पर उतर पड़े और हजार-हजार किलोमीटर की यात्रा २०-२० दिनों में पूरी किये। इस दौरान दूध मुंहे बच्चों को कोई माँ अपने  चिपका कर पैदल सड़क पर चल रही थी तो कहीं नंगे पाँव कोई बच्चा डगमगाते हुए क़दमों से चलकर अपने माता-पिता का साथ दे रहा है. इन बेचारों के पास खाने को एक दाना भी नहीं होता था न पीने को पानी। नोएडा से दिल्ली, लखनऊ से पटना, मुंबई से पटना की सड़कों पर पैदल, ठेले और साईकिल से चलने वालों रेला लगा हुआ था. उनका कष्ट देखकर समाज के लोग और पुलिस वाले भी रो पड़ते थे. इस सफर के दौरान पुलिस के बहादुर जवानों और सिविल सोसाइटी के लोगों ने इन जरूरतमंद राहगीरों की बहुत मदद करी. सिविल सोसाइटी के सहयोग से पुलिस के जवानों ने जगह-जगह खाने, पानी, दवा और कुछ हद तक परिवहन की ब्यवस्था की. हफ्तों तक ये सिलसिला अनवरत सड़कों पर चलता रहा और हमारे सिविल सोसाइटी के लोग तथा पुलिस के जवान बिना थके उनकी सेवा में लगे रहे. एक बार आप लोगों को भी सलाम। 

पुण्य प्रसून बाजपेयी जी से एक छोटी मुलाकात

आज दोपहर लगभग तीन बजे मैं नोएडा से जा रहा था। तो सहसा सेक्टर 6 में पहुंचते हीं मेरी नज़र उस शख्स पर पड़ी। जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सच की आवाज ‌हमेशा बुलंद किया। वो शख्स चाहे आज तक का "दस्तक" हो या एबीपी न्यूज का "मास्टरस्ट्रोक"। इन सभी शो में अपनी दमदार एंकरिंग से छा जाने वाले पूण्य प्रसून बाजपेयी जी से हुई। वो बिल्कुल सरल स्वभाव के इंसान हैं। उनसे रूक कर महज दो मिनट बात हुई होगी। क्योंकि वो अति ब्यस्त थे। जब मैंने उनसे उनके टी वी शो का उल्लेख किया तो उनका जवाब था कि आप हमारी यात्रा के बारे में काफी कुछ जानते हो। तो मैं बोला जी हां। इसके बाद वो अपने घर में चले गए। अब मुझे उनसे मिलने का इंतजार है। यह सत्य है कि जब भी मुझे किसी तथ्य की पुष्टि करनी होती है तो मैं सबसे पहले बाजपेयी जी को हीं सर्च करता हूं। बाजपेयी जी की ब्यस्तता के कारण उनके साथ एक तस्वीर भी नहीं ले सका। इसका मुझे मलाल है, लेकिन जब दोबारा मिलूंगा तो मैं मौका हाथ से जाने नहीं दूंगा। यह साल तो विश्व समुदाय के लिए मासूमियत वाला साल रहा है। लेकिन साल के अन्तिम दिन बाजपेयी जी से दो क्षण की मुलाकात हीं सही अन्त बढ़ियां बना गया।

Thursday, December 24, 2020

राहुल गांधी के नेतृत्व में सोशल मीडिया से निकलकर जमीन पर किसानों के पक्ष में समर्थन

दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसान भाइयों के समर्थन में लगभग 29 दिन बाद राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने सोशल मीडिया से निचे उतरकर जमीन पर प्रदर्शन किया और किसानों को अपना और अपनी पार्टी का समर्थन दिया। जो निश्चित तौर पर घाटा-मुनाफा का आंकलन करने के बाद समर्थन देने के बारे में निर्णय लिया गया होगा। और यह निर्णय एक देशवासी होने के नाते और जिम्मेदार विपक्ष होने के नाते जरूरी था। किसानों को समर्थन देने के लिए कांग्रेस पर राजनीति करने का भी आरोप लगाया जायेगा। जिसे कांग्रेस को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि कांग्रेस भी एक राजनीतिक पार्टी है और वो राजनीति करने के लिए है न कि भजन-कीर्तन करने के लिए।
राहुल गांधी की अगुवाई में महीनों बाद कांग्रेस पार्टी सभी बड़े नेताओं के साथ किसान बिल के विरोध में धरना प्रदर्शन किया। और दो करोड़ चिट्ठीयों के साथ राष्ट्रपति को मेमोरण्डम सौंपने की कोशिश किया। लेकिन कोरोना काल को देखते हुए राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी को हीं राष्ट्रपति तक पहुंचने का आदेश मिला। इस दौरान प्रियंका गांधी, वेणुगोपाल, सुष्मिता देव समेत काफी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को कुछ घंटों के लिए दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया फिर बाद में छोड़ दिया। कांग्रेस का किसानों के हक में प्रदर्शन राजनीतिक और विपक्षी पार्टी के लिहाज से उचित है। कांग्रेस को इस मुद्दे को जन-जन से जोड़ने की जरूरत है। कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में किसानों के हित को सबसे उपर रखकर बात करनी चाहिए। आम जन भी सरकार के पूंजीवादी मित्रों के बारे में जानता है। बस वह विकल्प नहीं मिल पा रहा है जिसे जनता अपना मत दे। आज के दौर को देखकर स्व.राहत इन्दौरी जी का एक शेर बरबस हीं याद आ रही है। जो कुछ इस तरह है-

लगेगी आग तो आयेंगे घर की जद में ।
यहां अकेले मेरा मकां थोड़ी है ।।

इससे यह सीख मिलती है कि काश ! शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों का साथ आज के प्रदर्शनकारी दिए होते। जब न तो इनको ये दिन देखना पड़ता और न हीं उन्हें। सरकार ने उस प्रदर्शन के माध्यम से देश की जनता का नब्ज टटोला और जब उन्हें लगा कि उम्मीद के मुताबिक सब धर्मों में विघटित हो चुके हैं। तो बिना वक्त गंवाए किसान बिल लाकर दोनों सदनों से पास करा दिया। मैं नहीं मानता कि इसमें सरकार की ग़लती थी। इसमें हमारी गलती थी‌। जिसका संघ और सरकार ने बस फायदा उठाया। एकत्र होंईए, अपनी लड़ाई अपने दम पर लड़िए। धर्म में अन्धे मत बनिए। हम सबका धर्म इतना कमजोर नहीं है जिसे कोई कांग्रेस या बीजेपी मिटा दे या स्थापित कर सके। 
किसान आन्दोलन पर सरकार का रवैय्या शाहीन बाग वाले प्रदर्शन की तरह हीं सख्त है। सरकार को लगता था कि किसानों से बात नहीं किया जायेगा तो वो थक-हार कर वापस चलें जायेंगे। पर सरकार का आंकलन गलत निकला। सरकारी पार्टी के प्रवक्ता शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को तो खुलेआम जिहादी, पाकिस्तान परस्त, आतंक परस्त बोल रहे थे पर किसानों के सन्दर्भ में खुलेआम नहीं बोल पा रहे हैं। क्योंकि यहां बहुतायत संख्या में हिन्दू अनुयायी हैं। भाजपा के प्रवक्ता मजबूरी वश मुंह सिले हुए हैं।

Friday, December 4, 2020

1988 के बाद किसानों का सबसे बड़ा और आन्दोलन

आजकल अन्नदाता पंजाब एवं दूसरे प्रान्तों से हजारों किलोमीटर दूर चलकर दिल्ली को घेरकर बैठे हुए हैं। उनकी बस एक मांग है कि जो जून महीने में सरकार कृषि संबंधी तीन नया बिल बनाया है। उसे किसी भी कीमत पर सरकार द्वारा वापस लिया जाना चाहिए। किसान दिसंबर की सर्द रात मे डंडे और पानी की बौछारों को सहते हरियाणा होते हुए दिल्ली तक आ पहुंचे हैं। जिसकी चिंता की लकीरें सरकार के माथे पर साफ-साफ महशूस की जा सकती है। जहां आन्दोलन की शुरुआत में सत्ता पक्ष और मिडिया इस आंदोलन को कभी सिर्फ पंजाब से जोड़ने की कोशिश करते थे तो कभी खालिस्तानियों के समर्थन से चलने वाला आन्दोलन बताते थे। वो सब आज किसानों से चार-चार दौर की बात कर रहे हैं। इस बिल से किसानों को बहुत समस्या है। उनमें सबसे बड़ी चिंता "कांट्रेक्ट फार्मिंग" को लेकर है। जिस पर वो एम एस पी पर सरकार से कानून में लिखित गारंटी मांग रहे हैं।

जैसा कि विभिन्न स्रोतों को आधार बनाकर दावा किया जा रहा है कि पूरे देश के लगभग 500 किसान संगठन इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। वस्तुत: 1988 के बाद सम्भवतः किसानों का यह पहला बड़ा और सफल आंदोलन मालूम पड़ता है। 1988 में देश भर के लाखों किसान टिकैत जी के नेतृत्व में बोट क्लब पर 10 दिन तक धरना दिया था। जिस का नतीजा ये रहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्री राजीव गांधी जी को धरना स्थल पर पहुंच कर किसानों की सभी मांगों को मानना पड़ा था।

आज एक बार फिर से इतिहास दोहराया जा रहा है। किसान अपनी पूरी ताकत से इस आंदोलन को धार दे रहें हैं। आज मैं नई दिल्ली ट्रेन पकड़ने के लिए जा रहा था। तो देखा कि डाबर से यू पी गेट वाले रास्ते को एक तरफ से पूरी तरह बंद कर दिया गया था और पुलिस का सख्त पहरा भी था। इससे प्रतीत होता है कि किसानों से सरकार डर रही है। चार दौर की वार्ता के बाद भी अभी कोई फैसला नहीं निकल पाया है। किसानों की समस्या को अब सरकार ने। एड्रेस करना शुरू किया है। काश यही संवेदनशीलता सरकार संसद में कानून पास करते समय दिखाई होती और चर्चा की होती तो आज यह हाल नहीं देखने को मिलता।