Monday, August 24, 2020

एक नजर आजादी के बाद बनें कांग्रेस अध्यक्षों पर

जे बी कृपलानी - महात्मा गांधी के शिष्यों में से एक थे बी कृपलानी जी को 1947 में अंग्रेजों से देश में सत्ता के हस्तांतरण के वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष थे. जे बी कृपलानी इस तरह से कहा जाय तो आजाद हिन्दुस्तान के पहले कांग्रेस अध्यक्ष थे. उन्होंने मेरठ सत्र की अध्यक्षता की थी. 

पट्टाभि सीतारमैय्या - वह 1948 और 1949 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. सीतारमैया भी गांधी वादी नेता थे. परन्तु सीतारमैया भाषाई आधारों पर प्रांत विभाजन के बहुत बड़े समर्थक थे. उन्होंने आजादी के हुए जयपुर सम्मेलन की अध्यक्षता की थी.

पुरुषोत्तम दास टंडन - वह 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे. टंडन जी हिंदी भाषा के बहुत बड़े विचारक और समर्थक थे उन्होंने नासिक सत्र की अध्यक्षता की थी. अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वह उन प्रमुख चेहरों में से एक थे जिन्होंने हिंदी के लिए आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग की थी.

प. जवाहरलाल नेहरू - भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी 1951 से लेकर 1954 तक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. नेहरू जी आजादी के पहले भी कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे.

यू एन ढेबर - साल 1955 से 1959 तक ढेबर कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उन्होंने अवडी, अमृतसर, इंदौर, गौहाटी और नागपुर में सत्रों की अध्यक्षता की थी. 

इंदिरा गांधी - साल 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गई थीं. इंदिरा गांधी जी भी आजादी आंदोलनों के दौरान भी जेल गयी थी.

नीलम संजीव रेड्डी - वह 1960 से 1963 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. उन्होंने बैंगलोर, भावनगर और पटना सत्रों की अध्यक्षता की थी. बाबू में चलकर रेड्डी जी भारत के छठे राष्ट्रपति बने.

के कामराज - वह 1964 से 1967 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. उन्होंने भुवनेश्वर, दुर्गापुर और जयपुर सत्रों की अध्यक्षता की थी. कांग्रेस पार्टी और भारतीय राजनीति में उन्हें "K" कामराज प्रदान का जनक भी माना जाता है। कामराज जी को भारतीय राजनीति में "किंगमेकर" के तौर भी जाना जाता है.

एस निजलिंगप्पा - वह 1968 से 69 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. निजलिंगप्पा देश की आजादी के आंदोलन और कर्नाटक के एकीकरण के प्रमुख सदस्य थे. निजलिंगप्पा प्रखर गांधी वादी थे.

जगजीवन राम - जगजीवन राम जी को 1970 से 1971 तक कांग्रेस अध्यक्ष थे. वह पिछड़े, अछूतों, दलितों और शोषित तबकों के नेता थे. जगजीवन राम जी बाबू जी के नाम से प्रसिद्ध थे. जगजीवन राम जी कांग्रेस की सरकार में केन्द्रीय मंत्री भी थे.

डा. शंकर दयाल शर्मा - शर्मा जी बहुत मृदुभाषी नेता थे. वह 1972 से 1974 तक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. आगे कालांतर में शंकर दयाल शर्मा जी भारत के नौवें राष्ट्रपति बने.

देवकांता बरुआ - देवकांत बरूआ जी इंदिरा गांधी जी के विश्वासपात्र थे. जिसकी बदौलत आपातकाल के दौरान उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। वह 1975-1977 कांग्रेस अध्यक्ष रहे. उन्होंने एक बार कहा था: "भारत इंदिरा है. इंदिरा भारत है. " हालांकि, बाद में उन्होंने इंदिरा का साथ छोड़ दिया था और कांग्रेस (Urs) में शामिल हो गए थे.

ब्रह्मानंद रेड्डी - वह 1977 से लेकर 1978 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. यह दौर आपातकाल के अन्तिम समय का था. इसके बाद हुए आम चुनाव में कांग्रेस और इंदिरा जी बुरी तरीके से हार गई थी और जनता पार्टी की पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी.

इस दौरान 1978 में कांग्रेस में विभाजन हो गया और बाद में इंदिरा वाले धड़े ने उन्हें फिर से पार्टी अध्यक्ष चुन लिया. इसके बाद एक छोटे से कालखण्ड को छोड़ दिया जाय तो वह 1984 में अपनी हत्या होने तक अध्यक्ष पद पर रहीं थीं. 

राजीव गांधी - इंदिरा जी की 1984 में हत्या के बाद  राजीव गांधी जी ने कांग्रेस की कमान संभाली और 1991 तक खुद की हत्या होने तक कांग्रेस अध्यक्ष पद पर काबिज थे. इसी दौरान वो अध्यक्ष के साथ-साथ प्रधानमंत्री भी रहे.

पी वी नरसिम्हा राव - राजीव गांधी जी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव जी 1996 तक कांग्रेस के अध्यक्ष थे. दक्षिण भारत से वह देश के पहले प्रधानमंत्री थे, उनके कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण हुआ था और "बाबरी विध्वंस" भी उन्हीं के प्रधानमंत्री काल में हुआ था.

सीताराम केसरी - वह 1996 से 1998 तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे. सीताराम केसरी के अध्यक्ष रहने के दौरान कांग्रेस में बहुत बड़ी टूट हुई. जिसका नुकसान कांग्रेस पार्टी आज भी उठा रही है.

सोनिया गांधी - कांग्रेस में शरद पवार की बगावत के बाद सोनिया जी 1999 में कांग्रेस अध्यक्ष बनी थीं. उसके बाद लगातार 2017 तक अध्यक्ष पद पर काबिज रही थी.

राहुल गांधी - सोनिया गांधी जी के इस्तिफा देने के बाद 2017 में राहुल गांधी जी ने अध्यक्ष पद को संभाला था और फिर 2019 में लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद एक बार फिर  सोनिया जी को पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था.


Sunday, August 23, 2020

कल कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक, अध्यक्ष पद पर गहलोत गांधी परिवार के बाद दूसरे संभावित उम्मीदवार

कल दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय पर कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की बैठक होने वाली है। ये बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण होगी कि सोनिया गांधी जी को कांग्रेस अंतरिम अध्यक्ष बनने के एक साल बाद की जा रही है। यह बैठक कांग्रेस के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है। सुनने में यह आ रहा है कि कांग्रेस के कुछ नये-पुराने कुल २३ नेता सोनिया गांधी जी को संगठन प्रमुख पद के चुनाव के लिए चिट्ठी लिखी है। जिनमें कुछ लोग राहुल गांधी जी को अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनने की सिफारिश कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने और पुराने दो गुटों में बंटती जा रही है। एक ओर जहां पंजाब के मुख्यमंत्री श्री अमरिंदर सिंह, राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी सोनिया गांधी का समर्थन कर रहे हैं तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेष बघेल जी एवम् असम राज्य प्रमुख रिपुन बोला राहुल गांधी का अध्यक्ष पद के लिए समर्थन कर रहे हैं।

इन सबके बीच राहुल गांधी जी ने बार-बार दोहराया है कि वो अगला कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनना चाहते हैं तो उनके बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी दूसरे सर्वमान्य नेता मालूम पड़ते हैं। क्योंकि गहलोत को सोनिया और राहुल दोनों का वरदहस्त प्राप्त है। राहुल, गहलोत को गुजरात चुनाव के बाद और मानने लगे हैं। जिस तरह से गुजरात की एकतरफा लड़ाई को अपने कौशल के दम पर रोमांचक बना दिया था। उसे देखकर राहुल गांधी को गहलोत के उपर और यकीन हो गया। वैसे गहलोत राहुल के पिता स्व. राजीव गांधी जी के जमाने के नेता हैं। 

गहलोत राजस्थान के लिए तीन बार से ज्यादा मुख्यमंत्री की संभाली और प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इन सबके बीच गहलोत की छवि राजस्थान में एक जनप्रिय नेता के तौर पर रही है। गहलोत राजस्थान की आमों-खास के नेता कहे जाते हैं। हाल हीं में सचिन पायलट और उनके संबंधों को लेकर थोड़ा विरोध किया जा सकता है। फिर भी गहलोत मजबूत स्थिति में नजर आते हैं। गहलोत कांग्रेस के कुछ आसानी से मिलने-जुलने वाले नेताओं में से एक है। कांग्रेस पार्टी में गहलोत दूसरे ऐसे नेता हैं जिनका विरोध पार्टी के भीतर कम होगा। गहलोत के पास संगठन और सरकार चलाने का अनुभव ब्यापक अनुभव है। जो उन्हें कांग्रेस के संभावित मुखिया के तौर पर स्थापित करने में सहयोग कर सकती है बनिस्पत राहुल गांधी अपने पुराने फैसले पर अडिग रहते हैं।

Tuesday, August 18, 2020

फेसबुक की निष्पक्षता पर भारत में बवाल क्यों ?

आजकल देश में सोशल मिडिया को लेकर काफी चर्चा की जा रही है। जिनकी कुछ जायज और कुछ नाजायज वजहें हैं। ताज़ा चर्चा देश में आज फेसबुक को लेकर है। जिसका देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मुखर होकर चर्चा और बहस कर रही है। अमूमन आप फेसबुक चलाने वाले लोग इस अनुभव से दो-चार हो रहे होंगे कि जब भी आप अपने विचार को फेसबुक के माध्यम से रखतें हैं। तो अगर एक खास विचार धारा (दक्षिण पंथी) को पसंद नहीं आती है तो ऐसे लोग गाली-गलौज करने लगते हैं। जिससे कई बार मैं भी दो-चार हुआ हूं। उनके गन्दे कमेन्ट के बाद कई बार बहुत ग्लानि होती है। पर क्या करें आज का दौर सोशल मीडिया का है।

आइए फेसबुक पर सवाल क्यों खड़े हो रहें हैं ?

  1. फेसबुक जानबूझ कर बीजेपी और संघ समर्थकों के आपत्तिजनक विडियो और लेख अपने प्लेटफार्म से नहीं हटाया।
  2. फेसबुक बीजेपी के बनिस्पत दूसरे पेजों और विडियो पर तत्काल कार्रवाई करते हुए अपने प्लेटफार्म से हटा देता है।
  3. फेसबुक धर्म विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले बीजेपी नेताओं कपिल मिश्रा, अनंत हेगड़े, डी राजा सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि इसी केस में ट्विटर ने अनंत हेगड़े का अकाउंट ब्लाक कर दिया था।
  4. फेसबुक सुरक्षा का आम देखने वाली आंखी दास ने फेसबुक टीम के साथ हुए मीटिंग में यह बात कही कि यदि भाजपा नेताओं के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई की गई तो भारत में फेसबुक की कमाई पर विपरित असर पड़ सकता है।
  5. फेसबुक पर महिलाओं के बारे में ओछी टिप्पणी के सन्दर्भ में आंखी दास ने फेसबुक के एक अमेरिकी अधिकारी को कहा कि, आप इसे रहने दिजिए, भारत में ऐसा होता है।

यदि फेसबुक को पूर्व की भांति जनता का विश्वास बहाल करना है तो बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करनी चाहिए। और नफरती भाषण और लेखों को तुरंत अपने डाटा सेंटर से हटा देना चाहिए। फेसबुक को मैकेनिज्म के माध्यम से फर्जी अकाउंट और उससे होने वाले अशोभनीय कमेन्ट को रोकने की दिशा में कुछ जरूरी सुधार वाले कदम अविलंब उठाने चाहिए।

Monday, August 10, 2020

लौट आए पायलट फिर भी गहलोत जीते

लगभग डेढ़ महीने से चला आ रहा राजस्थान का गतिरोध का आज पटाक्षेप होने को‌ है। जहां एक तरफ राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट जी तीन निर्दलीय और १९ कांग्रेस विधायकों समेत मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी के खिलाफ बगावत का झण्डा बुलन्द किए हुए थे। आज उसी गहलोत के आगे नतमस्तक हुए हैं। जहां एक तरफ बागियों का प्रतिनिधित्व पायलट कर रहे थे वहीं दूसरी ओर कांग्रेस एवं सरकार का जिम्मा गहलोत के हाथों में आलाकमान ने सौंप दिया था। इस दरम्यान आरोप भी मुख्यमंत्री द्वारा पायलट पर लगाए गए, अमूमन शान्त रहने वाले लोगों गहलोत जी द्वारा पायलट के लिए कुछ कटु वचनों का भी प्रयोग किया गया। इस दौरान पायलट की तरफ से विशेष सावधानी बरती गई। जो शायद पायलट के ग्रूप ने रणनितिक रूप से किया था। जिसकी वजह से आज दोबारा कांग्रेस पार्टी में पायलट की वापसी संभव हुई।

बीते डेढ़ महीने के राजनीतिक अस्थिरता के बीच सचिन पायलट कभी भी कांग्रेस के खिलाफ खुलकर नहीं आए। अलबत्ता रणनितिक रूप से उनके विधायक जरूर मिडिया में नाना प्रकार के मसाला परोसने का काम करते थे। पायलट तो वाकई कांग्रेस से बगावत कर चुके थे। लेकिन भाजपा के साथ जाकर सरकार बनाने लायक उनके पास घोड़ों की संख्या नहीं थी। जिसके कारण विधायकों के दबाव बस या यूं कहें कि मजबूरी बस वो कांग्रेस में लौट आने को मजबूर हुए। अन्यथा वो भी सिंधिया बन गये होते और राजस्थान भी कांग्रेस मुक्त हो गया होता। गहलोत ने अपनी पूरी आस्था कांग्रेस नेतृत्व में दिखाई जिसकी वजह से गहलोत आज पायलट पर भारी दिखाई दे रहें हैं। अब तो एक बात कांग्रेस और भाजपा दोनों को हीं मान लेना चाहिए कि राजस्थान में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के कद का कोई दूसरा नेता नहीं है। 

अब जब सभी नाटकों का पटाक्षेप होने वाला है तो सचिन पायलट को कुछ वाजिब सवालों का जवाब राजस्थान की ८ करोड़ जनता को जरूर देना होगा-

१- सचिन पायलट राजस्थान सरकार में उप-मुख्यमंत्री थे और संगठन अध्यक्ष भी थे तो उन्हें कौन सा सम्मान नहीं मिला वो जनता को बताएं ?

२- वह कौन सा मुद्दा था जिसके लिए पायलट को बगावत करने के लिए मजबूर होना पड़ा ? जनता के सामने सत्य आना चाहिए।

३- कोरोना के समय में सभी विधायक बाड़ेबंदी में रहे जबकि उस समय उन्हें अपने क्षेत्र की जनता के साथ रहना चाहिए था। इसके लिए किसको जवाबदार माना जाए ?

४- अब कांग्रेस आपको कौन सा सम्मान देगी ? इसकी क्या गारंटी की आप फिर से बगावत नहीं करेंगे ?

५- अब जबकि पायलट जी आपकी निष्ठा सशंकित हो चुकी है। तो राज्य की जनता आप के उपर क्यों और कैसे विश्वास करेगी ?



Saturday, August 8, 2020

भारत छोड़ो आन्दोलन के शुरुआती दिवस पर महात्मा गांधी जी का दिया गया पहला भाषण

आज मैं भारत की आज़ादी के नायक और महान संत राष्ट्र पिता श्री महात्मा गांधी जी के बारे में बात करना चाहूंगा. आज का दिन भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है जब करोड़ों वासियों ने तय कर लिया था कि अब हमें गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकना है. उसकी जो भी कीमत हो वो अदा किया जायेगा। जब बापू ने इस तरह के ख्वाब जनमानस के हृदय में जगाया होगा तो उन लोगों के मन में भी एक सवाल  बार-बार यह जरूर उठ रहा होगा कि क्या देश अंग्रेजों के चेलों की बातों पर यकीन तो नहीं करेगा. लेकिन गांधी जी के एक आह्वाहन ने संघ के लोगों का साथ छोड़ गांधी जी की समाज में आ गए और उस स्वर्णिम सफर की यात्रा पर निकल गये। जिसका नाम था "आजादी." भारत छोड़ो  आन्दोलन के शुरू होने से पहले मुबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी जी ने जो भाषण दिया था. उसी भाषण को सुनकर सारा देश एक सूत्र में बंध गया था . वह पूरा भाषण मैंने पढ़ा या सुना नहीं था. यह पूरा भाषण एक किताब में दर्ज है. किताब का नाम है डी जी तेन्दुलकर द्वारा लिखित गांधी जी की जीवनी. किताब के  छठवें खंड में पूरा भाषण शब्दशः दर्ज है. महात्मा गांधी ने वह भाषण हिन्दुस्तान की सरल एवं आम भाषा में दिया था. आप कह सकते हैं कि उस कालजयी भाषण में हिंदी,उर्दू और गुजराती के कई शब्द प्रयोग में लाए गये थे. उस किताब में भाषण मूल रूप से अंग्रेज़ी भाषा में लिखा है. फिर बाद में उसे हिंदी भाषा में भी परिवर्तित किया गया. 
यह भाषण 7 अगस्त 1942 को दिया गया था. वह अधिवेशन का पहला दिन था. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उन्होंने अधिवेशन की शुरुआत की. उसके तुरंत बाद गांधी जी ने अपनी बात कही. करीब हजार शब्दों का भाषण गांधी जी ने उस अधिवेशन में दिया था. "अंग्रेजों भारत छोड़ो" का प्रस्ताव आठ अगस्त को पास हुआ. जिस सुबह यह भाषण हुआ ठीक उसी रात गांधी जी, कस्तूरबा गांधी सहित पूरी कांग्रेस कमेटी को गिरफ्तार कर लिया गया .ब्रिटेन की वार कैबिनेट ने वायसरॉय को यह आदेश दे दिया था कि वायसरॉय जैसा चाहे वैसा कांग्रेस नेताओं के साथ ब्यवहार कर सकता है. इसी कुटिल सोच के कारण हीं वह भारत छोडो आन्दोलन के प्रस्ताव के पास होते ही गांधी जी समेत पूरी कांग्रेस कार्यसमिति को गिरफ्तार करने की फिराक में थे. अंग्रेजी शासकों की मूल योजना थी कि गाँधी जी को देश से बाहर ले जाकर अदन में नज़रबंद किया जाए और बाकी नेताओं को न्यासालैंड में रखा जाए. 9 अगस्त की सुबह 5 बजे सभी नेताओं को एक विशेष ट्रेन से पूना ले जाया गया ,जहां महात्मा जी और उनके साथियों को उतार दिया गया. बाकी नेता अहमदनगर फोर्ट की जेल में ले जाए गए. सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, पट्टाभि सीतारमैय्या और हरेकृष्ण महताब को अलग कमरे मिले थे. जवाहरलाल नेहरू के कमरे में डॉ सैय्यद महमूद थे. शंकर राव देव और प्रफुल्ल चन्द्र घोष एक कमरे में थे. आचार्य कृपलानी, गोविन्द बल्लभ पन्त, आचार्य नरेंद्र देव और आसफ अली को एक साथ रखा गया था. डॉ राजेन्द्र प्रसाद बीमार थे इसलिए आ नहीं सके थे. उन्हें गिरफ्तार करके बिहार में ही रखा गया था. भूलाभाई देसाई और चितरंजन दास को गिरफ्तार नहीं किया गया था क्योंकि इन लोगों ने खुद को भारत छोड़ो आन्दोलन से अलग कर लिया था. तो यह सूची हमारे उन स्वतन्त्रता के महानायकों की है। जिन्होंने हमारे लिए अपनी कुर्बानियां दी और हमें आजाद विचारों के साथ जिन्दा कर गए और खुद अमर हो गए. गांधी, पटेल, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना आजाद की कहानी तो हमारी पीढ़ी के लोगों को बस किताबों के माध्यम से हीं मिलेगी। जिसके लिए हमें थोड़ा अधिक उर्जा खर्च करने की आवश्यकता होगी.
गांधी जी का वह पूरा भाषण यहां प्रस्तुत है .महात्मा गांधी ने कहा कि -
” प्रस्ताव पर चर्चा शुरू करने से पहले मैं आप सभी के सामने एक या दो बात रखना चाहूँगा, मैं दो बातो को साफ़-साफ़ समझना चाहता हूँ और उन दो बातों को मैं हम सभी के लिये महत्वपूर्ण भी मानता हूँ। मैं चाहता हूँ की आप सब भी उन दो बातों को मेरे नजरिये से ही देखे, क्योंकि यदि आपने उन दो बातों को अपना लिया तो आप हमेशा आनंदित रहोंगे.
यह एक महान जवाबदारी है। कई लोग मुझसे यह पूछते है की क्या मैं वही इंसान हूँ जो मैं 1920 में हुआ करता था, और क्या मुझमे कोई बदलाव आया है। ऐसा प्रश्न पूछने के लिये आप बिल्कुल सही हो। मैं जल्द ही आपको इस बात का आश्वासन दिलाऊंगा की मैं वही मोहनदास गांधी हूँ जैसा मैं 1920 में था.
मैंने अपने आत्मसम्मान को नही बदला है।आज भी मैं हिंसा से उतनी ही नफरत करता हूँ जितनी उस समय करता था. बल्कि मेरा बल तेज़ी से विकसित भी हो रहा है। मेरे वर्तमान प्रस्ताव और पहले के लेख और स्वभाव में कोई विरोधाभास नही है. वर्तमान जैसे मौके हर किसी की जिंदगी में नहीं आते लेकिन कभी-कभी एक-आध की जिंदगी में जरुर आते है. मैं चाहता हूँ की आप सभी इस बात को जाने की अहिंसा से ज्यादा शुद्ध और कुछ नहीं है, इस बात को मैं आज कह भी रहा हूँ और अहिंसा के मार्ग पर चल भी रहा हूँ.
हमारी कार्यकारी समिति का बनाया हुआ प्रस्ताव भी अहिंसा पर ही आधारित है, और हमारे आन्दोलन के सभी तत्व भी अहिंसा पर ही आधारित होंगे। यदि आप में से किसी को भी अहिंसा पर भरोसा नहीं है तो कृपया करके इस प्रस्ताव के लिये वोट ना करें। मैं आज आपको अपनी बात साफ़-साफ़ बताना चाहता हूँ। भगवान ने मुझे अहिंसा के रूप में एक मूल्यवान हथियार दिया है। मैं और मेरी अहिंसा ही आज हमारा रास्ता है.
वर्तमान समय में जहाँ धरती हिंसा की आग में झुलस चुकी है और वही लोग मुक्ति के लिये रो रहे है, मैं भी भगवान द्वारा दिये गए ज्ञान का उपयोग करने में असफल रहा हूँ, भगवान मुझे कभी माफ़ नही करेगा और मैं उनके द्वारा दिये गए इस उपहार को जल्दी समझ नही पाया। लेकिन अब मुझे अहिंसा के मार्ग पर चलना ही होंगा.
अब मुझे डरने की बजाए आगे देखकर बढ़ना होगा।हमारी यात्रा ताकत पाने के लिये नहीं बल्कि भारत की आज़ादी के लिये अहिंसात्मक लड़ाई के लिए है. हिंसात्मक यात्रा में तानाशाही की संभावनाए ज्यादा होती है जबकि अहिंसा में तानाशाही के लिये कोई जगह ही नही है. एक अहिंसात्मक सैनिक खुद के लिये कोई लोभ नही करता, वह केवल देश की आज़ादी के लिये ही लढता है। कांग्रेस इस बात कोलेकर बेफिक्र है की आज़ादी के बाद कौन शासन करेंगा.
आज़ादी के बाद जो भी ताकत आएँगी उसका संबंध भारत की जनता से होगा और भारत की जनता ही ये निश्चित करेंगी की उन्हें ये देश किसे सौपना है. हो सकता है की भारत की जनता अपने देश को पेरिस के हाथो सौपे. कांग्रेस सभी समुदायों को एक करना चाहता है ना की उनमें फूट डालकर विभाजन करना चाहता है.
आज़ादी के बाद भारत की जनता अपनी इच्छानुसार किसी को भी अपने देश की कमान सँभालने के लिये चुन सकती है. और चुनने के बाद भारत की जनता को भी उसके अनुरूप ही चलना होंगा. मैं जानता हूँ की अहिंसा परिपूर्ण नहीं है और ये भी जानता हूँ की हम अपने अहिंसा के विचारो से फ़िलहाल कोसों दूर है लेकिन अहिंसा में ही अंतिम असफलता नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है, छोटे-छोटे काम करने से ही बड़े-बड़े कामो को अंजाम दिया जा सकता है.
ये सब इसलिए होता है क्योंकि हमारे संघर्षो को देखकर अंततः भगवान भी हमारी सहायता करने को तैयार हो जाते है. मेरा इस बात पर भरोसा है की दुनिया के इतिहास में हमसे बढ़कर और किसी देश ने लोकतांत्रिक आज़ादी पाने के लिये संघर्ष किया होगा. जब मै पेरिस में था तब मैंने कार्लाइल फ्रेंच प्रस्ताव पढ़ा था और पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भी मुझे रशियन प्रस्ताव के बारें में थोडा बहुत बताया था. लेकिन मेरा इस बात पर पूरा विश्वास है की जब हिंसा का उपयोग कर आज़ादी के लिये संघर्ष किया जायेगा तब लोग लोकतंत्र के महत्त्व को समझने में असफल होंगे.
जिस लोकतंत्र का मैंने विचार कर रखा है, उस लोकतंत्र का निर्माण अहिंसा से होगा, जहाँ हर किसी के पास समान आज़ादी और अधिकार होंगे. जहाँ हर कोई खुद का शिक्षक होंगा और इसी लोकतंत्र के निर्माण के लिये आज मै आपको आमंत्रित करने आया हूँ। एक बार यदि आपने इस बात को समझ लिया तब आप हिन्दू और मुस्लिम के भेदभाव को भूल जाओंगे. तब आप एक भारतीय बनकर खुद का विचार रखोगे और आज़ादी के संघर्ष में साथ दोगे. अब प्रश्न ब्रिटिशों के प्रति आपके रवैये का है। मैंने देखा है की कुछ लोगों में ब्रिटिशो के प्रति नफरत का रवैया है.
कुछ लोगो का कहना है की वे ब्रिटिशों के व्यवहार से चिढ चुके है. कुछ लोग ब्रिटिश साम्राज्यवाद और ब्रिटिश लोगों के बीच के अंतर को भूल चुके है. उन लोगों के लिये दोनों ही एक समान है. उनकी यह घृणा जापानियों की आमंत्रित कर रही है। यह काफी खतरनाक होगा. इसका मतलब वे एक गुलामी की दूसरी गुलामी से अदला बदली करेंगे.
हमें इस भावना को अपने दिलों दिमाग से निकाल देना चाहिये. हमारा झगडा ब्रिटिश लोगों के साथ नही हैं बल्कि हमें उनके साम्राज्यवाद से लड़ना है. ब्रिटिश शासन को खत्म करने का मेरा प्रस्ताव गुस्से से पूरा नही होने वाला.
यह किसी बड़े देश जैसे भारत के लिये कोई ख़ुशी वाली बात नही है की ब्रिटिश लोग जबरदस्ती हमसे धन वसूल रहे है. हम हमारे महापुरुषों के बलिदानों को नही भूल सकते. मैं जानता हूँ की ब्रिटिश सरकार हमसे हमारी आज़ादी नही छीन सकती, लेकिन इसके लिये हमें एकजुट होना होगा. इसके लिये हमें खुद को घृणा से दूर रखना चाहिए.
खुद के लिये बोलते हुए, मैं कहना चाहूँगा की मैंने कभी घृणा का अनुभव नही किया. बल्कि मैं समझता हूँ की मैं ब्रिटिशों के सबसे गहरे मित्रो में से एक हूँ. आज उनके अविचलित होने का एक ही कारण है, मेरी गहरी दोस्ती. मेरे दृष्टिकोण से वे फ़िलहाल नरक की कगार पर बैठे हुए है. और यह मेरा कर्तव्य होगा कि मैं उन्हें आने वाले खतरे की चुनौती दूँ. इस समय जहाँ मैं अपने जीवन के सबसे बड़े संघर्ष की शुरुवात कर रहा हूँ, मैं नहीं चाहता की किसी के भी मन में किसी के प्रति घृणा का निर्माण हो.”
इसके बाद गांधी जी ने 1945 तक  कोई  भाषण नहीं किया क्योकि वे जेल में बंद थे. बापू का आजादी के प्रति समर्पण देख लोग गिरफ्तार होते रहे और नए लोग काम सँभालते रहे .आखिरकार अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा .