Monday, January 6, 2020

जेएनयू में हिंसा करने वाले दंगाई या आतंकी

हाल के दिनों में देश में हिंसा और नफरत के भाव में बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शुरू होकर जामिया मिलिया होते हुए हिंसा दिल्ली के प्रितिष्ठित जेएनयू विश्व विद्यालय तक पहुंच चुका है. पिछले 63 दिनों से छात्र और शिक्षक मिलकर फीस वृद्धि के खिलाफ शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे थे. जो कल रात अचानक हिंसक हो गया. कुछ नकाबपोश गुंडे या इन्हें आतंकवादी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. वहां प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच पहुंचे और उत्पात मचाना शुरू कर दिया. जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष जो कि एक महिला है उसके साथ दुर्ब्यवहार किया और उसे बुरी तरह मारकर लहू-लुहान कर दिया. इस संघर्ष में दो दर्जन से ज्यादा घायल छात्रों को एम्स समेत दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है.

दंगाई छात्रों की पहचान 
ये दंगाई छात्र आतंकी कसाब की तरह मुंह पर नकाब बाँध कर आये थे. मानों इन्हें अपने पहचाने जाने का डर था. फिर भी अपने कृत्य से ये पहचाने गए. जो इनका नारा था, जो उद्घोष था. उससे ये समझ आ गया था कि ये लोग आज के वही है. जिनके माफीवीर सावरकर आदर्श है. जो अंग्रेजों की चमचागिरी करते थे. आज भी मुँह दिखाने का नैतिक साहस इनमें नहीं था. आपको मेरा चैलेंज है कि जेएनयू से अच्छा कम से कम एक विश्वविद्यालय बना कर तो दिखाइए, अच्छी गुणवत्ता परक शिक्षा देकर जेएनयू को पीछे करो. ये देशहित में है. साहेब ने झारखंड के चुनावी में नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को कहा था कि 'प्रदर्शन करने वाले कौन लोग है ? इन्हें इनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है'. ऐसा उन्होंने किसी ख़ास धर्म को इंगित करते हुए कहा था. अब व्ही देश कह रहा है कि प्रचारमंत्री महोदय इन आतंकियों का कपड़े देखकर पहचान करो और देश को बताओ कि इन दंगाइयों का संबंध किस संगठन से है ?

दंगाइयों को जेएनयू में घुसकर हमला करने के साहस का राज 
पिछले कुछ सालों से ये देखा गया है कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी को एक सुनियोजित तरिके से बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री, सांसद, विधायक, टुटपुँजिये नेता सब के सब विश्वविद्यालय के प्रति जहरीली भाषा का प्रयोग कर रहें हैं और जनता को बरगला रहे हैं. हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और कॉल ड्राप मंत्री रविशंकर प्रसाद जेएनयू के विद्यार्थियों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' क़हकर सम्बोधित करते हैं. ये वो लोग है जो जवाहर लाल यूनिवर्सिटी तो छोड़ो शायद किसी यूनिवर्सिटी का मुंह नहीं देखा है. इन्हीं लोगों की वजह से इन दंगाइयों, आतंकियों को हिंसा करने का नैतिक बल मिला.
  
लेफ्ट-राइट का आरोप-प्रत्यारोप 
जेनयू में हुई हिंसात्मक घटना पर लेफ्ट और संघ समर्पित छात्र संगठन ABVP एक-दूसरे पर आरोप मढ़ रहें हैं. जबकि विभिन्न मीडिया चैनलों पर प्रसारित हो रहे नारों में साफ़ सुना जा सकता है कि 'गोली मारो सालों को, लेफ्टिस्टों को मारो'. इत्यादि नारे सुनकर एक साधारण मनुष्य कृत्य में शामिल विचार के लोगों को सुन और समझ सकता है कि वो किस विचारधारा के द्योतक है.
जब यह हिंसात्मक घटना हो रहा था उस वक्त जैसा सुनने में आ रहा है कि दिल्ली पुलिस वहीं मौजूद थी और एक दर्शक की भांति चुप-चाप तमाशा देख रही थी. घंटों कोहराम मचाने के बाद दंगाई शान से दिल्ली के बहादुर पुलिस के सामने से लाठी, रॉड, डंडा लहराते हुए निकल जाते हैं और पुलिस उनके हौसले को सलाम करती रहती है.

जेएनयू के पूर्व छात्र तथा बुद्धजीवी जेएनयू के पक्ष में लामबंद हुए 
जेएनयू में हुई इस निंदनीय हिंसा को लेकर विश्वविद्यालय के पुराने छात्र एवं सेवानिवृत्त शिक्षक अब एकजुट होकर छात्रों के समर्थन में खड़े हो गए है. 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी भी छात्रों के साथ अपनी एकजुटता को प्रदर्शित किया है. मालूम हो कि 80 के दशक में अभिजीत जी जेएनयू के हीं छात्र रहें हैं. इनके अलावा देश के तमाम पत्रकार, बुद्धजीवी, राजनेता, मुख्यमंत्री जिनमें क्रमशः श्री शेष नारायण सिंह, आशुतोष, योगेंद्र यादव, विवेक अग्निहोत्री, उद्धव ठाकरे, दिल्ली पुलिस के वकील, अनिल कपूर, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अरविन्द केजरीवाल, शरद पवार, ममता बनर्जी, स्टालिन इत्यादि. इनके अलावा करोड़ों लोग छात्रों के साथ हुए हिंसक बर्ताव के खिलाफ सड़कों पर खड़े हैं और अपने-अपने तरिके से सरकार के खिलाफ विरोध अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं.




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