Monday, January 27, 2020

आंदोलन से जन्में नेताओं को आज का आंदोलन अलोकतांतिक क्यों लगने लगा है ?

जैसा कि देश के हर जागृत नागरिक को पता है कि देश के साथ क्या किया जा रहा है ? देश के संविधान के साथ क्या खिलवाड़ किया जा रहा है ? परन्तु इन सब बातों के बीच देश दो धड़ों में बट गया है. एक धड़ा सत्ताधारी और उसके समर्थन में संघ जैसे अनुषांगिक संगठन हैं तो दूसरे धड़े में आंदोलनरत छात्र, महिलायें, स्वयं सेवा समूह हैं. जिनमें हिन्दू-मुस्लिम, दलित, पिछड़ा सब शामिल हैं. नागरिक संशोधन क़ानून के खिलाफ आंदोलन देश भर में तकरीबन डेढ़ महीने से चल रहा है. दिल्ली का शाहीन बाग़ इस आंदोलन की आत्मा का कार्य कर रही है. पूरे देश में लोग शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन को अपना आदर्श मान रहें हैं. सत्ताधारी दल और संगठन शाहीन बाग़ के आंदोलनकारियों को पाकिस्तान परस्त, देशद्रोही जैसे तमाम उपमाएं देकर अपने समर्थकों को खुश करने में कामयाब तो हो रही है. परन्तु देश की आत्मा को गहरा आघात पहुंचा रही है. परन्तु जब बात असम समेत पूर्वोत्तर के भाजपा शासित राज्यों में हो रहे विशाल आंदोलनों की आती है तो इनका हिन्दू-मुस्लिम और पाकिस्तान वाला तर्क अपने आप असफल हो जाता है. देशवासी इनके स्वांग को समझने लगे हैं.   
आज का आंदोलन बिना किसी चेहरे का है. आज के आंदोलन को छात्र और महिलाएं अपने आप को समर्पित करके आगे की तरफ ले जा रहें हैं. कल शाहीन बाग़ में देखा गया कि प्रदर्शन स्थल पर लाखों लोग इकट्ठा हुए थे और भारत के राष्ट्रध्वज को गगन की बुलंदियों में फहराया गया था तथा ध्वजबंदन और राष्ट्र गीत से पूरा आसमान गूंजायमान हो गया था. मैं इन्हें कैसे मान लूँ कि ये देशद्रोही है. ये पाकिस्तान परस्त हैं. ऐसा कह के हम भारत की मिट्टी का अपमान कर रहें हैं. 
1974 में इंदिरा की कांग्रेस सरकार के खिलाफ जब आंदोलन शुरू हुआ तो सबसे बड़ी आवाज बिहार की माटी से निकली थी और उस स्थान का नाम पटना विश्विद्यालय था. जहाँ से छात्रों ने बढ़ी हुई फीस के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था और सरकार के सह पर छात्रों पर पुलिस ने भारी बल प्रयोग किया था. इस प्रदर्शन में बहुत से छात्र बुरी तरह घायल हुए थे. इंदिरा गांधी ने जब 1975 में आपातकाल की घोषणा के तो देशवासियों को पता चल गया था कि उनके सारे अधिकारों को छीन लिया गया है. उनके अधिकारों को पूर्णतया कुचल दिया गया है. जिसकी वजह से लोग सड़कों पर उतर पड़े थे और जेलों में उठाकर भर दिए गए थे. लेकिन आज के दौर में आपातकाल की घोषणा तो हुई नहीं पर जनता के अधिकारों को धारा 144 के माध्यम से छीन लिया गया है. शाहीन बाग़ जैसे अहिंसक आंदोलनों को भी पुलिस की मदद से कुचलने का प्रयास किया जा रहा है. जो आपातकाल की पुनरावृत्ति है. पटना विश्वविद्यालय के इकबाल छात्रावास से छात्र जब निकले तो वो पुलिसिया पिटाई में खून से लथ-पथ हो चुके थे और इसी अवस्था में वो जे पी जी के पास पहुंचे और छात्रों ने जे पी जी से उस आंदोलन की अगुआई करने की प्रार्थना की. तब जे पी जी ने कहा था कि "मैं हिंसा के साथ खड़ा नहीं हो सकता हूँ. आप लोगों को पहले वादा करना होगा कि आप लोग आंदोलन को हिंसात्मक नहीं करेंगे. जभी मैं आप लोगों के साथ खड़ा होऊंगा. छात्रों ने जे पी जी को आश्वत किया और वो छात्रों के साथ खड़े हुए और उस आंदोलन के मुख्य भूमिका रहे. जिनका समर्थन पीछे से जनसंघ (भाजपा), संघ कर रहा था. लेकिन शाहीन बाग़ के आंदोलन का मुख्य चेहरा कोई राजनितिक पार्टी नहीं है. जब 18 मार्च 1974 में जे पी के अगुआई में छात्र विधान सभा का घेराव करने पहुंचे तो वहां पुलिस का बहुत तगड़ा बंदोबस्त था. दिल्ली से पुलिस पटना विधान सभा के आस-पास तैनात कर दी गयी थी. वहां पर जमकर लाठीचार्ज हुआ, गोलियां चली, आँसू गैस के गोले दागे गए. बहुत से प्रदर्शनकारी छात्र बुरी तरह घायल हुए थे पर पर उनका हौसला नहीं हारा था. पटना में उन दिनों "सर्चलाइट और प्रदीप" नाम के दो अखबार छापने वाले केंद्र थे. उनमें आग लगा दी गयी थी. वास्तव में उसी दिन सत्ता की चूले हिल चुकी थी. बस उनका पतन होना बाकी था.
इस आंदोलन के बाद उपजी नई परिस्थिति में जे पी जी ने 5 जून को पटना के गांधी मैदान में जो भाषण दिया था. वो एक मिसाल बन गया और छात्रों के जज्बे को आसमान के बराबर उचांई दे दी. जे पी जी ने कहा - महात्मा गांधी ने तो आपसे कहा था कि हमें अपना जिंदगी दे दिजिये और हम अंग्रेजों को देश से बाहर निकाल देंगे. लकिन हम आपसे सिर्फ एक बरस मांगते हैं. उस एक बरस में यूनिवर्सिटी और कॉलेज बंद किजिये. हम राजनितिक सत्ता को उखाड़ फेकेंगे." उस एक साल को खत्म होते-होते 25 जून 1975 को आपातकाल लगा दिया जाता है. ये ताकत उस छत्र आंदोलन की थी. खैर वो बात अलग है कि जे पी जी खुद कांग्रेस से निकले हुए थे. इंदिरा हारने के बाद जब जे पी से मिलने पहुंची तो जे पी को देखकर काफी भावुक हो उठी थी और वही हाल जे पी जी का भी था. जे पी जी इंदिरा जी को बेटी मानते थे. उन्होंने कहा था कि मैं सरकार से लड़ रहा था इंदिरा से नहीं.
नागरिकता क़ानून पर सरकार इसे संसद से पास हुए क़ानून की दुहाई दे रही है तो आंदोलनकारी इसे संविधान पर हमला बता रहें हैं. गरीब-मजदूर के खिलाफ बता रहें हैं. लेकिन बिहार की धरती से उपजा वो जे पी आंदोलन अब पुराना हो चुका है. उसके मूल्य पुराने हो चुके है. जो उस आंदोलन में शामिल थे. आज मुख्य मंत्री, केंद्र सरकार में मंत्री, विधायक बन चुके हैं और उन्हें इस तरह के आंदोलन अब देश के खिलाफ लगने लगा है. 1974 के छात्र आंदोलन में शामिल चेहरे आज की सरकार में शामिल हैं. जिनमें कुछ मुख्य नाम इस तरह है - रविशंकर प्रसाद केंद्रीय क़ानून मंत्री, नितीश कुमार मुख्यमंत्री बिहार, सुशील मोदी उप-मुख्यमंत्री बिहार, लालू यादव पूर्व मुख्यमंत्री बिहार (राजद), शिवानंद तिवारी, कृपानाथ यादव, वशिष्ठ नारायण सिंह जैसे तमाम नेता जे पी के छात्र आंदोलन की पैदाइस हैं. आज इन्हें आंदोलन अलोकतांत्रिक लगने लगा है. आप तय करें कि आप किसके साथ खड़े हैं. देश के भविष्य के साथ या देश को हिन्दू-मुसलमान में विभाजित करने वालों के साथ. 

Saturday, January 25, 2020

केन्द्र सरकार के हठ का परिणाम शाहीन बाग़

राजनीति आज के दौर में शायद अहम का सबसे उदाहरण बन गया है. ये पहले भी होते रहें हैं पर उस समय उनके हृदय में एक नैतिक शर्म हुआ करती थी. जो आज नहीं हैं. 1975 में अगर इंदिरा गांधी जी ने देश के जनता के ऊपर अनैतिक तरिके से 'आपातकाल" थोपा था. पर जब उन्हें एक लम्बे अवधि के बाद अपनी गलती का आभास हुआ. उन्होंने पूरे देश से सार्वजनिक तौर पर देश के प्रबुद्ध नागरिकों से माफी माँगी थी. मगर आज की सत्ता में वो बात नहीं हैं. मोदी की पहली और दूसरी सरकार ने सिलसिलेवार तरिके से कई विवादित फैसले किये.जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जान भी चली गई. पर इनको जरा भी अफ़सोस नहीं था. नोटबंदी करते हुए आतंकवाद, नक्सलवाद, कालाधन इन समस्याओं से निजात पाने का वादा किया था पर हकीकत कुछ नहीं रूका अलबत्ता सैकड़ों लोग बैंक की लाइन में लगाकर जान दे दी और उसे सरकार ने नोटबंदी की वजह भी नहीं मानी। जबकि इंसान बैंकों के सामने लगी लाइनों में अपना दम तोड़ते रहे.
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में नागरिकता संशोधन क़ानून आया जिस पर देश के सभी हिस्सों में आंदोलन छिड़ा हुआ है. जनता सड़कों पर उत्तरी हुई है. दिल्ली का शाहीन बाग़ का प्रदर्शन देश के आंदोलनकारियों के लिए मिसाल बन चुका है. पर सरकार अपने हठ के आगे उनसे बात तक करने को तैयार नहीं है. इस क़ानून के पारित होने के बाद देश के तमाम हिस्सों से हिंसा की खबरें आने लगी. जिसमें मीडिया रिपोर्ट के हवाले से बात किया जाय तो अकेले उत्तर प्रदेश में दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मृत्यु हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में हुई. इस आंदोलन में शामिल लोगों को सरकार ने देशद्रोही करके एक झटके में हीं उनके अस्तित्व को खारिज कर दी. उन लोगों के मौत का फर्क उनके परिवारीजन को पड़ेगा लेकिन सरकार को नहीं. अभी चार दिन पहले लखनऊ में रैली करते हुए गृह मंत्री शाह जी ने कहा कि "अब लोगों को भूल जाना चाहिए कि सरकार ये क़ानून वापस लेगी।" उनके इसी भाषण से सरकार के हठ को समझा जा सकता है.
शाहीन बाग़ को देश के हर कोने से हर तबके के लोगों का समर्थन मिल रहा है. शाहीन बाग़ को भी अपने उच्च नैतिकता को बचा कर रखने की जरूरत है. कल न्यूज़ नेशन के पत्रकार दीपक चौरसिया शाहीन बाग़ पर स्टोरी करने के लिए गए थे. वहां उनके साथ बदतमीजी की गई. जो अत्यंत निंदनीय है. ठीक है उनकी बात आपको पसंद नहीं तो आप मत सुनो परन्तु उनको भी अपनी बात रखने का मौलिक अधिकार है. शाहीन बाग़ को इन विवादों से दूर रहना होगा नहीं तो ऐसी घटनाएं उनके आंदोलन पर विपरीत असर डालेंगी. जिस तरिके से आप आप 40 दिन से शांति पूर्वक बिना हिंसा के अपनी आवाज रख रहें हैं. उसे देश की जनता देख रही है और अपने-अपने तरिके से उसकी ब्याख्या भी कर रही है. सरकार नहीं अब देश को आंदोलन हीं आगे ले जाने का काम करेगी.
आज के दौर में आंदोलन करना एक अभिशाप बन गया है. खैर सत्ता पर जो पार्टी आसीन है वो आंदोलन की हीं उपज है और उसे आज आंदोलन देश विरोधी लगने लगा है. आपातकाल का आंदोलन हो या जे पी आंदोलन हो. आज के सत्ताधारी दल दोनों आंदोलनों में अपना सब कुछ झोंक दिया था और जे पी के अगुवाई में 1977 का जो आंदोलन चला वो कांग्रेस सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंका था. जे पी आंदोलन का मुख्य केंद्र सहीं बाग़ की तरह पटना था. उस वक्त इन दरबारी मंत्रियों को वह आंदोलन देश हित में लग रहा था और आज का आंदोलन पाकिस्तान परस्ती का. इसे समय का फेर नहीं बल्कि पूरा-पूरा दोगलापन कहा जाना चाहिए. सरकार को प्रदर्शनकारियों से बात करनी चाहिए और उनकी समस्याओं को सुनकर उनके मन में पल रहे शंकाओं को दूर करना चाहिए. आखिरकार वो भी अपने देश के हीं नागरिक है. सरकार तो वार्ता करने को तैयार है परन्तु उसे ऐसा करने की संघ अनुमति नहीं दे रहा है.        

Saturday, January 18, 2020

शाहीन बाग़ में आंदोलन के बीच संघ का पूरा होता सपना

शाहीन बाग़ दिल्ली में जो नजारा पिछले 35 दिनों से देश देख रहा है. वो निरंतर अपने रूप का विस्तार करता जा रहा है. आज पूरे देश में लगभग शाहीन बाग़ जैसा हीं नजारा देखने को मिल रहा है. चाहे लखनऊ हो, पटना हो, भोपाल, अमृतसर, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ या उत्तर-पूर्व का भाग हो. सब जगह प्रदर्शनकारी पुरूष, महिला, बच्चे पूरे आत्मबल के साथ जमे हुए हैं. उनके हौसले को पूस थी ठंडी रात भी नहीं तोड़ पा रही है. उन प्रदर्शनकारियों को राजनितिक दलों और विभिन्न समाज सेवी संगठनों का भी साथ मिल रहा है. लेकिन उनके बारे सत्ताधारी पार्टी और उसके नेता घटिया बात भी कर रहे हैं. बीजेपी के कुछ नेता कहते हैं ट्विटर पर ट्रेंड करवाते हैं कि शाहीन बाग़ की औरतें बिकाऊ हैं. 500 रूपये दिन पर आती है तो वहीं अनुज वाजपेयी नामक नेता कहते हैं कि साहीन बाग़ के प्रदर्शनं स्थल पर निरोध फेके हुए मिल रहे हैं. देश की आधी आबादी के बारे में इनकी घटिया सोच से हीं आप इनके मूल चरित्र का आंकलन कर सकते हैं.
इस आंदोलन को मैं इन सब से बहुत दूर देख पा रहा हूँ. यह सरकार जैसा कि हर कोई जानता है नागपुर से चलाई जा रही है. उसके कुछ उदाहरण मैं आपके सामने रखना चाहता हूँ. जैसे कि अभी इन्होंने नागरिक संशोधन क़ानून को उच्च सदन से पारित करवाकर कानूनी अमलीजामा पहना दिया. परन्तु इस क़ानून पर पूरे देश में भीषण प्रदर्शन हो रहें हैं. हालांकि शुरू में ये प्रदर्शन हिंसक थे परन्तु अब शान्ति पूर्वक चल रहा है. देश की जनता के दबाव को सरकार समझी और नागपुर में नड्डा समेत दर्जन भर बीजेपी नेताओं ने संघ मुख्यालय में भेंट की और देश में हो रहे आंदोलनों के बारे में अवगत कराया. परन्तु संघ की तरफ से ये कहा गया कि नागरिकता क़ानून पर पीछे नहीं मुड़ना है और इसे वर्तमान हालात में हीं लागू किया जाना चाहिए. जिस पर सरकार ने हामी भरी. साहीन बाग़ प्रधानमंत्री निवास से बहुत दूर नहीं हैं. लेकिन संघ का दखल होने की वजह से वो बहुत दूर हो गया है और नागपुर दिल्ली क्व बहुत नजदीक हो चुकी है.
संघ का चेहरा धीरे-धीरे करके देश की जनता के सामने आने लगा हैं. जो ये कहते थे कि संघ मात्र के सामाजिक संस्था है न कि राजनितिक. अब उस झूठ को लोगों ने पहचानना शुरू भी कर दिया है. जो संघ कभी हिन्दू राष्ट्र का हिमायती था. आज वो उन्हीं सपनों को पूरा करने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. पर संघ के उस हिन्दू राष्ट्र के कल्पना में अर्थब्यवस्था भी देशी हो ऐसी सोच थी. लेकिन अब तो ऐसा नहीं है. जो संघ से संबंध रखने वाली भारतीय मजदूर संघ एफडीआई और दुसरे फैसलों पर पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में सड़क जाम कर देती थी. अब वो कहाँ है ? संघ ने अब उन्हें मोदी सरकार की नीतियों में हाँ में हाँ मिलाने को मजबूर कर दिया है और स्वयं सेवकों को अब ये भी दर सताने लगा है कि अगर मोदी के सत्ता से जाने के बाद किसी और की सत्ता आती है. तब इन स्वयं सेवकों का क्या योगदान होगा ? तब तक तो ये स्वयंसेवक पूरी तरह मोदीमय हो चुके होंगे. संघ आज खुद में उलझन में है कि वो सावरकर को माने या भागवत को. १९२३ में जब सावरकर ने हिंदुत्व पर किताब लिखी थी उस पर हेडगेवार की सहमति थी और उसे नागपुर के हीं प्रकाशक ने छापी थी. लोकल चुनाव में नागपुर भी बीजेपी हार जाती है. जहां स्वयंसेवक परिवारों में रहते हैं तो इसका मायना यह निकाल लिया जाना चाहिए कि स्वयंसेवक भी अब अपना वजूद तलाशने लगे हैं. लोकल चुनाव में केंद्रीय मंत्री गडकरी के गाँव से भी बीजेपी नहीं जीत पायी और पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस के क्षेत्र में भी बीजेपी हार गई. तो इसके क्या मायने निकाले जाने चाहे ? क्या स्वयंसेवकों को अपने भविष्य का अंदाजा हो गया है.
संघ 1925 में बना उसके बाद उसकी बच्चा पार्टी जनसंघ से होते हुए बीजेपी का यह तीसरा सरकार है. जिसमें पहली अटल जी के नेतृत्व में और दूसरी लगातार दो बार मोदी जी के नेतृत्व में. संघ को कि अब वो अपने मूल अजेंडे को अगर लागू नहीं कर पाती है तो फिर कभी नहीं. उसके पीछे कारण यह है कि लोकसभा में जनता ने बीजेपी को 272 के जादुई आंकड़ें से कहीं ज्यादा सीट दी है और राजयसभा में भी बहुत अच्छी स्तिथि में है. अगर कुछ दिन और इन्तजार करना पड़ा तो राजयसभा का खेल बिगड़ सकता है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, झारखण्ड हार चुकी है और इस वर्ष होने वाले दिल्ली चुनाव में इनकी हालत अच्छी नहीं है और बिहार में गठबंधन में हैं. इस वजह से संघ अब इसे अभी नहीं तो कभी नहीं की तर्ज पर ले रहा है. 
जिस सनक में उसे अपने देश के नागरिकों का आवाज सुनाई नहीं दे रहा है. लेकिन इतिहास गवाह है कि इंसान के आत्मबल के आगे क्रूर से क्रूर सरकार को भी झुकना पड़ता है. जिस प्रकार दक्षिण अफ्रिका की सरकार कुछ इसी तरह के कानून पर महात्मा गांधी ने नेतृत्व वाले आंदोलन के सामने झुकी थी और उसे निरस्त की थी. इस धर्म के आधार भेदभाव वाले क़ानून की भर्तस्ना अति आवश्यक है. मानवता से बढ़ कर कोई धर्म नहीं है. यही हमारे इस महान देश ने सिखाया है.

          



Thursday, January 16, 2020

हिन्द स्वराज - 'कांग्रेस के कर्ता-धर्ता' पर मेरी समझ

12 जनवरी को मैं दिल्ली के प्रगति मैदान से महात्मा गांधी जी की लिखित पुस्तक 'हिन्द स्वराज, हिन्दी वर्जन में खरीदी। मूलतः यह किताब गुजराती भाषा में लिखी गयी है. जो सिसकी प्रस्तावना पढ़ने के बाद पता चलती है. विभिन्न प्रकाशकों द्वारा यह किताब भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवादित करके छापी गयी है. गांधी जी बताते है कि यह किताब उन्होंने 1908 में लंदन से दक्षिण अफ्रिका से लौटते समय लिखी थी. गांधी जी ने अपने इस किताब में कुल बीस अध्याय का जिक्र किया है. जिसमें से अभी मैनें मात्र चार अध्याय कांग्रेस और उसके कर्ता-धर्ता, बंगाल का विभाजन, अशांति और असंतोष तथा स्वराज क्या है ? इसे हीं पढ़ा है. इतना पढ़ने के आधार पर 'हिन्द स्वराज' के अर्थ को मैं अपने विवेक अनुसार समझने की कोशिश करता हूँ. 

कांग्रेस के कर्ता-धर्ता 
कांग्रेस के कर्ता-धर्ता शीर्षक अध्याय में बापू जी ने कहा कि कांग्रेस ने हीं हिन्द में स्वराज की भावना को जन्म दिया. जैसा कि "नेशनल" शब्द हीं स्वराज का विचार है. बापू जी ने हिन्द के प्रति दादा भाई नैरोजी, प्रोफेसर गोखले, मिस्टर ह्यूम, सर विलियम वेडरबर्न, जस्टिस बदरुद्दीन जैसी महान शख्सियतों का हिन्द के प्रति नजरिये को दर्शाया है. मूलतः यह किताब एक सवाल-सबाब (पाठक और सम्पादक) के भाव में लिखी गयी है और इसी के माध्यम से ज्वलंत प्रश्नों का जबाब भी दिया गया है. पाठक के रूप में किसी के मन में ये विचार आया कि दादा भाई नैरोबी जी तो अंग्रेजों के साथ हमें अच्छी संबंध बनाने की नसीहत देते हैं तो इसका भी उत्तर देते हुए बापू जी ने उसके प्रश्नों को गौड़ किया कि दादा भाई ने हमें अंग्रेजों से लड़ने के लिए हौसला दिया है. हम उन्हें कैसे गलत मान सकते है ? आप ये कैसे कह सकते हैं कि सारे अंग्रेज बुरे होते हैं ? मेरा मानना है जैसे हमारे यहां कुछ लोग हैं जिनको देश के कुछ लोग बुरे लगते हैं. वैसे हीं तो अंग्रेजों में भी हैं. जिनमें  कुछ अंग्रेज लोगों को कुछ अंग्रेज हीं बुरे लगते हैं. ह्यूम ने हमारे लिए जो किया वो कम नहीं है . सर विलियम वेडरबर्न ने जो हमारे स्वराज के लिए लिखा-बोला क्या कम है ? हम किसी की भूमिका को नकार नहीं सकते। देश लोगों के उज्ज्वलित भावनाओं से बनता है न कि किसी एक ब्यक्ति के. गांधी जी हमेशा से एक ऐसे विचार पैदा करने की कोशिश में रहे जिनका अर्थ हमेशा हिन्द से जुड़ा रहे. क्योंकि गांधी जी ने दक्षिण अफ्रिका में इस तरह के अनुभवों को जिया था. वहां से उन्हें हिन्द की कल्पना करने की एक किरण दिखाई दी. जो आगे चलकर हिन्द को आजाद कराने तक चली. इस किताब को पढ़ने के बाद एक बात समझ में आती है कि बापू जी स्वराज के बारे में हमेशा खुले विचारों का समर्थन किया है. ऐसा नहीं लगता कि उन्हें नफरत के विचार ने जकड़ रखा है. उन्होंने अपनी कमियों को स्वीकारने में भी कोई कोताही नहीं बरती है.   

प्रथम अध्याय से मैं एक सवाल और बापू जी का जबाब इसमें सम्मिलित कर रहा हूँ. 
पाठक : आपकी यह बात मुझे पसंद आई. इससे मुझे जो ठीक लगे वह बात करने की हिम्मत आई है. अभी मेरी एक शंका रह गई है. कांग्रेस के आरम्भ से स्वराज की नींव पड़ी, यह कैसे कहा जा सकता है ?
सम्पादक : देखिये, कांग्रेस ने अलग-अलग जगहों पर हिन्दुस्तानियों को इकट्ठा करके उनमें 'हम एक राष्ट्र हैं' ऐसा जोश पैदा किया. कांग्रेस पर सरकार की कड़ी नजर रहती थी. महसूल का हक प्रजा को होना चाहिए, ऐसी मांग कांग्रेस ने हमेशा की है. जैसा स्वराज कैनेडा में है वैसा स्वराज कांग्रेस ने हमेशा चाहा है. वैसा स्वराज मिलेगा या नहीं मिलेगा, वैसा स्वराज हमें चाहिए या नहीं चाहिए, या उससे बढ़कर कोई दूसरा स्वराज है या नहीं, यह सवाल अलग है. मुझे दिखाना तो इतना हीं है कि कांग्रेस ने हिन्द को स्वराज का रस चखाया. इसका जस कोई और लेना चाहे तो वह ठीक न होगा, और हम भी ऐसा मानें तो बेकदर ठहरेंगे. इतना हीं नहीं, बल्कि जो मकसद हम हासिल करना चाहते हैं उसमें मुसीबतें पैदा होंगी. कांग्रेस को अलग समझने और स्वराज के खिलाफ मानने से हम उसका उपयोग नहीं कर सकते.  
                                                                                                    हिन्द स्वराज 
                                                                                               पेज संख्या 16 
                                                                                               प्रकाशक : शिक्षा भारती 



                                                                                        
      

Friday, January 10, 2020

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कश्मीरी नागरिकों के सुप्रीम राहत

सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से सरकार की दलीलों से पूरी तरह सहमत नहीं रहा. उसी का नतीजा है कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने आज एक कमेटी का गठन किया है. जिसमें कश्मीर में धारा 370 के खत्म होने के बाद लगी पाबंदियों  की समीक्षा करके 7 दिन के अंदर रिपोर्ट देने का आदेश दिया. इस दौरान धारा 144 की भी समीक्षा की जायेगी. माननीय सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की धारा 19 अभिब्यक्ति की आजादी को फिर से परिभाषित किया. हाल के दिनों में देखा गया है कि जिस भी सरकार के खिलाफ कोई आवाज उठती है. उसे तुरंत धारा 144 का उपयोग करते हुए बंद करा दिया जाता है. जो उस नागरिक के मौलिक अधिकारों का उलंघन करता है. अदालत ने इन्हीं बातों का ध्यान रखा है. 
माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ई-बैंकिंग की ब्यवस्था को तत्काल बहाल करने का आदेश दिया है. माननीय अदालत ने सरकार के कुछ प्रतिबंधों खत्म किया और कुछ को खत्म करने के लिए एक कमेटी का भी गठन करते हुए सरकार को आदेश दिया कि कश्मीर में लगाई गयी पाबंदी के दस्तावेजों को जनता के सामने सार्वजनिक करने का आदेश दिया है. सरकार हमेशा से इंटरनेट बैन को सही ठहराने की कोशिश कर रही थी. लेकिन अदालत ने माना है कि आज के समय में अपनी अभिब्यक्ति को ब्यक्त करने के लिए इंटरनेट हीं उपयुक्त साधन है. इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करना है. कोर्ट बार-बार धारा 144 के उपयोग पर भी सख्त टिप्पणी की और कहा कि जब भी धारा 144 लगाया जाय तो 7 दिन के अंदर उसे रिवीव जरूर किया जाना चाहिए. धारा 144 को बार-बार लगाना सत्ता का दुरूपयोग दम्भ होता है. इससे हर संवेदनशील सरकार को बचना चाहिए.
         

Wednesday, January 8, 2020

ईरान का ईराक के अमेरिकी सैन्य बेस पर मिसाइल से हमला

कल रात से आज सुबह तक दो बड़ी खबरें सामने आयी हैं. उनमें से एक तो देश के अंदर से है और दूसरा देश के बाहर से. पर दोनों अपने-अपने स्थान पर बहुत महत्वपूर्ण हैं. पहली खबर दीपिका का जेएनयू पहुंचना रहा और दूसरी खबर ईरान का इराक में गठबंधन सेना पर मिसाइल से हमला करना रहा. 

ईरान का ईराक में गठबंधन सेना के बेस पर बैलेस्टिक मिसाइल से करारा हमला 
हम बात की शुरुआत दूसरी खबर से करना चाहते हैं. सुबह जैसीं हीं सो कर उठा और 8 बजे के आस-पास जैसे हीं टीवी सेट ऑन किया और न्यूज़ चैनल का चयन किया. मेरी आँखे खुली की खुली रह गयी. ब्रेकिंग न्यूज़ के तौर पर एक खबर बार-बार चल रही थी और वो थी ईरान का ईराक की भूमि पर अमेरिकी गठबंधन सेना के बेस पर मिसाइलों से हमला करना. ये खबर पूरे विश्व के लिए बहुत बड़ी थी. हमारे भारत के लिए भी. जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया वैसे-वैसे तस्वीर और साफ़ होती गयी तथा नुकसान की तस्वीर भी साफ़ होती रही. ईरानी सरकार ने भारतीय समयानुसार लगभग साढ़े 11 बजे मीडिया को बताया कि ईराक के तीन बेस अल असद और इरबिल तथा ताजी पर 22 बैलेस्टिक मिसाइलों से हमला किया. जिसमें 80 सैन्य बलों के मारे जाने की पुष्टि हुई. ताजी को छोड़कर दोनों हमलों की पुष्टि अमेरिकी प्रशासन द्वारा की जा सकी है. 
अगर दोनों देश के बीच मचा घमासान जल्द नहीं सुधरता है तो उसका असर मध्य एशिया में बहुत बुरा पड़ेगा. आर्थिक, राजनैतिक और कूटनीतिक तौर पर विश्व समुदाय के सामने बहुत कठिन चुनौतियां होंगी. अभी से हीं किसी भी अनहोनी को भांपते हुए चीन, सिंगापुर समेत कुछ देशों ने ईरान की सीमा से होकर गुजरने वाली हवाई क्षेत्र से अपने जहाज़ों का उड़ान कुछ अवधि के लिए रोक दिया है.

ईरान-अमेरिका में जंग के हालात कैसे बने ?
3 जनवरी को ईरान के सबसे बड़े सैन्य कमांडर जनरल कुर्द फ़ोर्स के मुखिया कासिम सुलेमानी को इराक के बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले मार गिराया गया था. जिसमें सुलेमानी के अलावा नंबर दो को सैन्य अधिकारी समेत 6 और लोग मारे गए थे और मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ सुलेमानी के जनाजे में 10 लाख से ज्यादा लोग इकट्ठा हुए थे. उसी का बदला लेने के लिए ईरान ने अमेरिकी फ़ौज के ठिकानों पर हमला किया. अमेरिका और ईरान की तरफ से दोनों देशों को एक दूसरे के प्रति धमकी भरे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है. अब विश्व समुदाय की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि दोनों देशों को एक साथ बिठाकर बात-चीत के माध्यम से इस गतिरोध का हल निकाले और विश्व में शांति स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करे. 

जेएनयू में हुई हिंसा पर छात्रों को समर्थन देने पहुंची दिपिका पादुकोण 
दिपिका पादुकोण की 'छपाक' नाम से एक फिल्म आने वाली है. जो मुख्यतः तेज़ाब पीड़िता के ऊपर बनाई गयी है. पिछले दिनों कुछ नकाब पोशों ने जेएनयू में घुसकर बड़े पैमाने पर हिंसा की थी. जिसमें दो दर्जन से छात्र गंभीर रूप से घायल हुए थे और छात्र गुंडों की गिरफ्तारी के लिए आंदोलन कर रहे थे. उसी दौरान देर शाम खबर मिली कि आंदोलनकारी छात्रों को अपना समर्थन देने के लिए दीपिका भी वहाँ पहुंची है. जिसके बाद बीजेपी सहित भक्त आर्मी काफी उद्वेलित हो गयी. दीपिका को देशद्रोही बताने और उनकी फिल्म बायकाट करने का सोशल मीडिया पर एक माहौल बनाया जा रहा. परन्तु भक्त आर्मी से भूल रही है कि 'अगर भक्तों के देखने, न देखने से कोई फिल्म हिट या फ्लाप होती. तो मोदी जी की बायोपिक कभी फ्लाप नहीं होती.' लेकिन ट्रेंड चलाकर भक्त अपना मन बहलाने के लिए स्वतंत्र हैं. जेएनयू के समर्थन में अब बहुत सी हस्तियां सामने आ रहीं हैं. जो एक भविष्य के भारत के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है.

  
  
  

Monday, January 6, 2020

जेएनयू में हिंसा करने वाले दंगाई या आतंकी

हाल के दिनों में देश में हिंसा और नफरत के भाव में बहुत ज्यादा इजाफा देखने को मिला है. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शुरू होकर जामिया मिलिया होते हुए हिंसा दिल्ली के प्रितिष्ठित जेएनयू विश्व विद्यालय तक पहुंच चुका है. पिछले 63 दिनों से छात्र और शिक्षक मिलकर फीस वृद्धि के खिलाफ शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे थे. जो कल रात अचानक हिंसक हो गया. कुछ नकाबपोश गुंडे या इन्हें आतंकवादी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. वहां प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच पहुंचे और उत्पात मचाना शुरू कर दिया. जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष आइशी घोष जो कि एक महिला है उसके साथ दुर्ब्यवहार किया और उसे बुरी तरह मारकर लहू-लुहान कर दिया. इस संघर्ष में दो दर्जन से ज्यादा घायल छात्रों को एम्स समेत दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है.

दंगाई छात्रों की पहचान 
ये दंगाई छात्र आतंकी कसाब की तरह मुंह पर नकाब बाँध कर आये थे. मानों इन्हें अपने पहचाने जाने का डर था. फिर भी अपने कृत्य से ये पहचाने गए. जो इनका नारा था, जो उद्घोष था. उससे ये समझ आ गया था कि ये लोग आज के वही है. जिनके माफीवीर सावरकर आदर्श है. जो अंग्रेजों की चमचागिरी करते थे. आज भी मुँह दिखाने का नैतिक साहस इनमें नहीं था. आपको मेरा चैलेंज है कि जेएनयू से अच्छा कम से कम एक विश्वविद्यालय बना कर तो दिखाइए, अच्छी गुणवत्ता परक शिक्षा देकर जेएनयू को पीछे करो. ये देशहित में है. साहेब ने झारखंड के चुनावी में नागरिक संशोधन बिल के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को कहा था कि 'प्रदर्शन करने वाले कौन लोग है ? इन्हें इनके कपड़ों से पहचाना जा सकता है'. ऐसा उन्होंने किसी ख़ास धर्म को इंगित करते हुए कहा था. अब व्ही देश कह रहा है कि प्रचारमंत्री महोदय इन आतंकियों का कपड़े देखकर पहचान करो और देश को बताओ कि इन दंगाइयों का संबंध किस संगठन से है ?

दंगाइयों को जेएनयू में घुसकर हमला करने के साहस का राज 
पिछले कुछ सालों से ये देखा गया है कि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी को एक सुनियोजित तरिके से बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री, सांसद, विधायक, टुटपुँजिये नेता सब के सब विश्वविद्यालय के प्रति जहरीली भाषा का प्रयोग कर रहें हैं और जनता को बरगला रहे हैं. हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और कॉल ड्राप मंत्री रविशंकर प्रसाद जेएनयू के विद्यार्थियों को 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' क़हकर सम्बोधित करते हैं. ये वो लोग है जो जवाहर लाल यूनिवर्सिटी तो छोड़ो शायद किसी यूनिवर्सिटी का मुंह नहीं देखा है. इन्हीं लोगों की वजह से इन दंगाइयों, आतंकियों को हिंसा करने का नैतिक बल मिला.
  
लेफ्ट-राइट का आरोप-प्रत्यारोप 
जेनयू में हुई हिंसात्मक घटना पर लेफ्ट और संघ समर्पित छात्र संगठन ABVP एक-दूसरे पर आरोप मढ़ रहें हैं. जबकि विभिन्न मीडिया चैनलों पर प्रसारित हो रहे नारों में साफ़ सुना जा सकता है कि 'गोली मारो सालों को, लेफ्टिस्टों को मारो'. इत्यादि नारे सुनकर एक साधारण मनुष्य कृत्य में शामिल विचार के लोगों को सुन और समझ सकता है कि वो किस विचारधारा के द्योतक है.
जब यह हिंसात्मक घटना हो रहा था उस वक्त जैसा सुनने में आ रहा है कि दिल्ली पुलिस वहीं मौजूद थी और एक दर्शक की भांति चुप-चाप तमाशा देख रही थी. घंटों कोहराम मचाने के बाद दंगाई शान से दिल्ली के बहादुर पुलिस के सामने से लाठी, रॉड, डंडा लहराते हुए निकल जाते हैं और पुलिस उनके हौसले को सलाम करती रहती है.

जेएनयू के पूर्व छात्र तथा बुद्धजीवी जेएनयू के पक्ष में लामबंद हुए 
जेएनयू में हुई इस निंदनीय हिंसा को लेकर विश्वविद्यालय के पुराने छात्र एवं सेवानिवृत्त शिक्षक अब एकजुट होकर छात्रों के समर्थन में खड़े हो गए है. 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अभिजीत बनर्जी भी छात्रों के साथ अपनी एकजुटता को प्रदर्शित किया है. मालूम हो कि 80 के दशक में अभिजीत जी जेएनयू के हीं छात्र रहें हैं. इनके अलावा देश के तमाम पत्रकार, बुद्धजीवी, राजनेता, मुख्यमंत्री जिनमें क्रमशः श्री शेष नारायण सिंह, आशुतोष, योगेंद्र यादव, विवेक अग्निहोत्री, उद्धव ठाकरे, दिल्ली पुलिस के वकील, अनिल कपूर, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अरविन्द केजरीवाल, शरद पवार, ममता बनर्जी, स्टालिन इत्यादि. इनके अलावा करोड़ों लोग छात्रों के साथ हुए हिंसक बर्ताव के खिलाफ सड़कों पर खड़े हैं और अपने-अपने तरिके से सरकार के खिलाफ विरोध अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं.




Saturday, January 4, 2020

सावरकर की वीरता पर कुछ चुभते सवाल

'वीर सावरकर कितने वीर' शीर्षक से मध्य प्रदेश कांग्रेस सेवादल ने एक पुस्तक वितरित की है. जिसमें सावरकर की वीरता को लेकर कई प्रश्न खड़े किये गए हैं. ये भी कहा गया है कि गोडसे और सावरकर के बीच समलैंगिक संबंध थे. जो भी हो. इस बात पर विवाद भी हो रहा है. महाराष्ट्र में कांग्रेस, सेना और एनसीपी मिलकर एक तीन दलों की एक साझा सरकार चला रहे हैं. जिसकी अगुवाई सेना के नेता और बाला साहेब ठाकरे के पुत्र श्री उद्धव जी ठाकरे कर रहे हैं. शिव सेना सावरकर को देशभक्त या एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी मानती रही है. इस विवाद के बाद सेना संजय राउत ने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि सावरकर जी देश के महान वीर हैं. जो लोग ऐसी घटिया किताब बटवा रहे हैं. उनके दिमाग में गंदगी भरी है और वह किताब महाराष्ट्र नहीं आएगी.
ये तो रहा शिव सेना का जबाब. लेकिन यहां समझने वाली बात ये है कि कांग्रेस क्यों सावरकर को लेकर ऐसी बात करती है ? जिससे संघ और भाजपा तिलमिला जाती है. सावरकर नाम संघ/भाजपा का पीछा नहीं छोड़ पाता. पिछले साल दिसंबर में राहुल गांध ने रामलीला मैदान से बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा था कि " मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं हैं. मैं माफी नहीं मांगूंगा. मेरा नाम राहुल गांधी है." ऐसा उन्होंने 'रेप इन इंडिया' वाले अपने बयान के संदर्भ में कहा था. सावरकर का नाम अपनी जन सभाओं में बार-बार लेकर कांग्रेस क्या रेखांकित करना चाहती है ? कभी आपने सोचा है.
कांग्रेस सावरकर पर सवाल खड़े करके हिन्दू महासभा और संघ के चरित्र को नए सिरे से जनता को याद दिलाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस आज की आवाम को ये दिखाना चाह रही है कि जिस सावरकर को आज संघ/भाजपा देशभक्त, वीर और नाना प्रकार के विशेषणों से सम्मानित कर रही है, हकीकत में वो कैसे थे ?
बार-बार राहुल गांधी और कांग्रेस सावरकर की माफी का जिक्र करते है. तो वो माफी है क्या ? आइये थोड़ा जानते हैं 
सावरकर के जीवन को दो पहलुओं में देखना बहुत न्यायोचित होगा. इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि सावरकर के जीवन का परहम भाग जो कि 1909 के पहले का था. वो एक आला दर्जे के क्रांतिकारी और विद्वान का था. जहां वो अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सड़कों पर भी उतरने से परहेज नहीं किया था. ठीक इसके उलट सावरकर के जीवन का दूसरा भाग है. जिसकी शुरुआत 1909 के बाद होती है. उस दौर में देश को आजाद करना के समस्त सितारे अपनी जवानी पर थे और आजादी की जंग अपने चरम पर पहुंच सकी थी. 1911 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाले नेताओं सावरकर, नेहरू, भगत सिंह तथा सैकड़ों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दया गया. वहाँ पर सबने अपने-अपने हिस्से की सजा काटी परन्तु अण्डमान जेल में काला पानी सावरकार को भेज दिया गया. वहाँ से उनके जीवन के दूसरे भाग का जन्म होता है. काला पानी की सजा के कुछ महीनों के बाद सावरकर ने अंग्रेजी हुकूमत से लिखित माफी मांगने का सिलसिला शुरू किया. जो लगभग आधा दर्जन बार था. सावरकर ने अंग्रेज़ों को सौंपे अपने माफ़ीनामे में लिखा था, ‘अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता में मुझे रिहा करती है, मैं यक़ीन दिलाता हूं कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ी सरकार के प्रति वफ़ादार रहूंगा.’
कांग्रेस के नेतृत्व में जब 1942 में "भारत छोडो अभियान" चलाया गया. जब वो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे और उस वक्त भी सावरकर आंदोलन के खिलाफ थे. सावरकर देश के हिन्दुओं से सार्वजिनक अपील भी की थी कि आपको ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर आंदोलनकारियों के खिलाफ लड़ों और अंग्रेजी सेना का साथ दो. जब देश आजाद हुआ तो देश के संविधान को खारिज करने वाला संघ और हिन्दू महासभा ही थी. जिसके परिणामस्वरूप संघ ने अपने नागपुर मुख्यालय पर 2002 तक तिरंगा नहीं फहराया था.
सावरकर का असर कितना असर ?
जैसा कि सर्वविदित है कि भाजपा/संघ हमेशा से गांधी जी और नेहरू को नीचा दिखाना चाहती है और सावरकर को उनसे श्रेष्ठ या समतुल्य बताती है. चूंकि सावरकर को मानने वाले केवल महाराष्ट्र में है, जबकि गांधी को पूजने वाले पूरे देश में और विश्व भर में हैं. इसलिए कांग्रेस सावरकर के बहाने संघ सरकार पर बहुत तीखे हमले करती है. जिससे संघ सरकार हर बार अपने आप को असहज पाती है और जानबूझकर भी गांघी जी के खिलाफ कुछ बोल नहीं पाती है. जब भी ये गांधी जी को नीचा दिखाने की कोशिश करते है. तब-तब इन्हें मुंह की खानी पड़ती है. उदाहरण स्वरूप हम भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा को हीं ले ले. इन्होने ने दो बार गोडसे की तारीफ़ की और दोनों बार इन्हें तो इन्हें इनकी पार्टी को जनता से खुलेआम माफी मांगी पड़ी और तो और संघ के प्रचारक रह चुके और अब हमारे प्रधानमंत्री महोदय को प्रज्ञा के बयान पर खेद जताना पड़ा. कांग्रेस जानती है कि अगर इनके अति राष्ट्रवाद को रोकना है तो सावरकर का असली चेहरा जनता के सामने आज के परिप्रेक्ष्य में रखना जरूरी है. साथ हीं साथ गांधी जी के मूल्यों का प्रसार करना भी अति आवश्यक है. इन्हीं वजहों से कांग्रेस संघ सरकार पर जानबूझकर आक्रामक है.