Monday, September 23, 2019

ह्यूस्टन में मोदी की रैली में नेहरू का बखान

कल विश्व पटल और गोदी मीडिया के लिए रात एक न्य जश्न लेकर आयी थी जो अमरीका में टेक्सस राज्य के ह्यूस्टन शहर में आयोजित की गयी थी. उस जश्न वाली जगह का नाम 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम रखा गया था जिसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक साथ साझा रैली को सम्बोधित किया. जिसमें लगभग 50 (मीडिया रिपोर्टों के अनुसार) अमेरिकी और भारतीय लोग इकट्ठा हुए थे. जाहिर सी बात है आयोजन बड़ा था तो खर्च भी बड़ा हुआ होगा. वैसे मोदी जी की अपनी एक अलग हीं शैली है. जिसके दम पर औरों को बौना साबित करने की कोशिश करते हैं. साझा भीड़ को दोनों नेताओं ने सम्बोधित किया और भारत की तर्ज पर 'अबकी बार ट्रम्प सरकार' का नारा हमारे प्रधानमंत्री ने ह्यूस्टन की धरती से उद्घोष किया. यह सोचने का सवाल है कि क्या हमारे प्रधानमंत्री अब अमेरिका में भी चुनाव लड़ेंगे या ट्रम्प के समर्थन में रैली करेंगे ? अगर ट्रम्प फिर भी हार जाते हैं तो क्या वहां का अगला राष्ट्रपति भारत के सामान्य रिश्ता रखेगा ? क्या अब हर उस जगह हमारे प्रधानमंत्री जी प्रचार करने जाएंगे जहां चुनाव होगा। वो भले हीं विश्व के किसी भी देश में हो. क्या अमेरिका की जनता ट्रम्प को देशद्रोही का तमगा नहीं देगी ? क्या ट्रम्प से वहां का जनमानस ये नहीं सवाल करेगा कि हमारे चुनाव को बाहरी आदमी कैसे मैनेज कर सकता है ? शायद ! पूछेगी और तब ट्रम्प के पास उसका जबाब नहीं होगा। क्योंकि ट्रम्प भी दक्षिणपंथी विचारों के प्रवर्तक हैं और हमारे प्रधानमंत्री जी भी.

संघ, साहब, गोदी मीडिया के लिए कल उसी शो में शर्मिंदगी का सामना उस वक्त करना पड़ा. जब अमेरिका के निचले सदन में बहुमत के नेता हॉउस आफ रिप्रेज़ेंटेटिव और डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने कहा, ''अमरीका की तरह भारत भी अपनी परंपराओं पर गर्व करता है. जिससे वह अपने भविष्य को गांधी की शिक्षा और नेहरू की उस सोच जिसमें भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाने की बात है, उसका बचाव कर सके, जहां प्रत्येक व्यक्ति और उसके मानवाधिकारों का सम्मान किया जाएगा.'' जब यह वाकया हुआ उस वक्त मोदी जी वहीं खड़े थे और उन्हीं के स्वागत का कार्यक्रम चल रहा था. जब मंच से नेहरू और गांधी के नाम का जिक्र हुआ तो उस समय मोदी जी के चेहरा देखने लायक था. वो बिलकुल अधीर थे क्योंकि हत्यारे गोडसे , माफीवीर सावरकर और उपाध्याय का कहीं कोई जिक्र नहीं आया.



नेहरू की प्रसंशा सुनने के बाद भक्तों में अजीब तरह की बेचैनी छा गयी. हो भी क्यों न जब करोड़ों रूपये लगाकर मंच सजाया गया हो और उस मंच से उस आदमी का सम्मान किया जाए जिसे हमारे देश में गाली दिया जाता है और गाली देने वाला और कोई नहीं प्रधानमंत्री जी खुद सामने हों और नेहरू, गांधी का जिक्र हो जाय तो शर्म से मरने वाली बात हो जाती है. हमारे देश में हर समस्या का जड़ मोदी जी और उनकी पार्टी नेहरू जी को मानती है. दर्द तो तब और होता है जब नेहरू जी पीछा अमेरिका तक नहीं छोड़ते हैं. भक्त और संघ के लोग हलकान हैं कि ये नेहरू अपनी मृत्यु के बाद भी हमें शर्मिंदा करने से नहीं चूक रहा है.
          

Friday, September 20, 2019

ब्यापारियों का चुनावी चंदा सरकार ने किया वापस

जैसा की सर्वविदित है कि हमारी अर्थब्यवस्था दिनों-दिन गर्त में धंसती जा रही है. सरकार और वित्त मंत्री महोदया रोज नए-नए झुनझुने लेकर मीडिया के मार्फत जनता के बीच उपस्थित हो रहीं हैं. उसी कड़ी में आज भी माननीया वित्त मंत्री महोदया चैनलों के माध्यम से जनता के समक्ष अवतरित हुई और ढेर सारा बात कह गयी जिससे कि अर्थब्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके और देश के उद्योगपतियों को टैक्स में छूट दे दिया और तर्क देने लगी कि इससे उद्योग के लिए पैसे लगाने में सहूलियत होगी। पर मेरा मत उनसे अलग है और अलग क्यों हैं ये भी मैं आप को बताना चाहूँगा.
दरअसल बात ये है कि इन्हीं ब्यापारिक घरानों ने मतलब की जिनका आज टैक्स कम हुआ हैं उन्होंने हीं तो बीजेपी को 2014 और 2019 में चुनाव लड़ने का पैसा दिया था. जिसे अब वो मय ब्याज वसूल रहें हैं और सरकार जनता को बता रही है कि हम अर्थब्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए पैसा दे रहें है. तो सवाल ये उठता है कि फिर आपने अर्थब्यवस्था को कमजोर करने वाले कदम उठाये हीं क्यों ? क्या आपके पास इसका कोई जबाब है या नहीं ? अगर नहीं है तो इसके बारे में भी साहस कर के बोल दो कि 'मोदी है तो मुमकिन है'. जब मैं आपकी साहस को मानूंगा। बोल दो कि देश की अर्थब्यवस्था मुझे बदहाल हालत में मिली थी. अब तो कुछ दिनों से सरकार के प्रवक्ता, गोदी मीडिया और मंत्री जी मानाने लगे हैं कि देश मंदी के चपेट में है. इससे पहले विरोध का कोई नेता मंदी की बात करता था तो समूचा सत्ता तंत्र उसका मजाक बनाता था. अनेक-अनेक मजाक के शब्दों से उसकी छवि को धूमिल करने का प्रयास करते थे.
आज सुबह आज तक के एक कार्यक्रम में सड़क परिवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी जी ने भी माना कि देश के कुछ सेक्टर में सुस्ती है. उसमें हाऊसिंग सेक्टर की सुस्ती सबसे ज्यादा चिंता जनक है. उसके लिए उन्होंने मुंबई का भी जिक्र करते हुआ कहा कि जब किसी एक सेक्टर में सुस्ती आती है तो अपने साथ-साथ कइयों को सुस्त कर जाती है. तो सवाल ये उठता है कि आपने इतने गलत निर्णय लिए कैसे ? आज की खराब अर्थब्यवस्था के पीछे आपने बेशर्मी से कुछ ऐसे निर्णय लिए जिनका खामियाजा आज देश भुगत रहा है. उनमें नोटबंदी और जीएसटी प्रमुख हैं. नोटबंदी से देश को क्या हासिल हुआ ? नोटबंदी की सच्चाई देश के सामने कब आएगी ? जीएसटी से सरकार का कितना टैक्स जमा बढ़ा ? आखिर इन मुद्दों पर बात कब होगी ? कब तक गोदी मीडिया के लोग नेहरू जी के नाम का माला जपते रहेंगे ? नेहरू जी और कांग्रेस ने जो किया वो देश के सामने है. आपने क्या किया उसे देश को तो दिखाइए ? आपका विकास लापता है. रोजगार में 5 दशक का सबसे बड़ा संकट हैं. नोटबंदी के बाद लगातार अर्थब्यवस्था गिरती जा रही है. ऐसी मेहनती और ईमानदार सरकार से वो बेईमान और सुस्त सरकार हीं अच्छी थी.         

Tuesday, September 17, 2019

गांधी के सत्याग्रह का जन्म भाग-2

गाँधी जी के बारे जितनी भी बातें कही, लिखी या बोली जाए वो कम होगी. क्योंकि गाँधी जी का ब्यक्तित्व हीं ऐसा था कि उनके आस-पास के सभी विचार उनके समावेशी हो जाते थे. गाँधी जी के ऊपर लिखी अथवा छपी किसी भी किताब को अगर पढ़ा जाय तो आप आसानी से उनके विचारों का जुड़ाव समाज के प्रति समझ सकते हैं. गाँधी जी ने कोई भी काम बिना लक्ष्य के नहीं करते थे. जिस काम को करने की ठान लेते थे. उसे उसके अंजाम तक ले जाते थे. हम गाँधी जी के 'सत्याग्रह' को हीं समझने की कोशिश करें तो ऐसा प्रतीत नहीं होता कि सत्याग्रह की नींव गाँधी जी हमारे अपने देश में डाली थी, अपितु 'सत्याग्रह' एक सुसंगठित आंदोलन की तरह योजनाबद्ध तरिके से चलाया गया था. गांधी जी ने 18 जुलाई सन 1914 तक अफ्रिका में तमाम आंदोलनों की अगुवाई कर रहे थे. जिनमे वहां भारत से जाकर बसे ब्यापारी बंधु, गिरमिटिया मजदूर, खानों में मजदूरी करने वाले तथा नस्लवाद की खिलाफत करने करने वाले आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी.
गाँधी जी के विचारों का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. बापू के विचारों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपने आस-पास की बातों को समझें. गांधी जी ने किसी बातों को समझाने के लिए तर्क के रूप अपना उदाहरण देते थे और उसमें अनेक कड़ियाँ अपने आप जुड़ती जाती थी. जभी तो कृपलानी जी ने लिखा है कि ‘‘गांधीजी ने तर्क और गणित के आधार पर तैयार किया गया ऐसा कोई सिद्धान्त प्रस्तुत नहीं किया... गांधीजी इतनी द्रुतगति से विचार करते थे कि तर्क को श्रृंखलाबद्ध करनेवाली बीच की नेक कड़ियों को जोड़ने का उन्हें ध्यान ही नहीं रहता था. इन कड़ियो को उनकी जगह बिठाने का काम तो उन विचारों को कार्यान्वित करनेवाले कार्यकर्ताओं या उनका सैद्धांतिक अध्ययन-विवेचन करने वाले व्यक्तियों को ही करना पड़ता था,जो अपनी बुद् तथा अपने पर्यवेक्षण और अनुभव से ऐसा करते थे". 
विदेशी इतिहासकार लुई फिशर कहते है कि " अगर उस अंग्रेज के बच्चे को ये मालूम होता कि जिस आदमी को वो ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेक रहा वहीं आदमी एक दिन अंग्रेजी हुकूमत को पूरे ग्लोब से बाहर फेक देगा. तो ऐसी गलती कभी नहीं करता.
गांधी जी का विचार वैश्विक समाज के लिए बहुत हीं उपदेशी था. गांधी जी कहना था कि " आँख के बदले आँख फोड़ने से तो पूरी दुनिया हीं अंधी हो जायेगी". गाँधी जी कहते थे कि हम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब एक माँ की हीं संतान है. अगर हम आपस में लड़ेंगे तो दमनकारी अंग्रेजी हुकूमत से हमारी माँ को कौन आजाद कराएगा ? परन्तु आज के परिवेश में कुछ विध्वंशक विचार धारा के लोग निरंतर गाँधी जी को अपमानित करने का कार्य करते हैं. परन्तु वो भूल जाते हैं कि दुनियाँ के सामने जब भी कोई घातक सामाजिक चुनौती आती है तो विश्व के लोग गाँधी जी के बताये हुए सिद्धांत का अनुसरण करने पर जोर देते हैं न कि बदले की बात करने की. 

       

Saturday, September 14, 2019

हिंदी हमारी पहचान है

आज 14 सितंबर है जिसे हम भारतवासी एक पवित्र दिन "हिंदी दिवस" के रूप में याद करते हैं. वैसे तो हमारे संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है परन्तु हम हिंदी बोलने वालों के लिए यह हमारी मातृ भाषा है, प्राण भाषा है, पवित्र भाषा है. क्योंकि हम देशवासियों का हाथ अंग्रेजी में उतना हीं ढीला है जितना कि अंग्रेजों का हमारी मातृ भाषा में. मैं ये नहीं कहता कि सभी लोगों को हिंदी बोलनी चाहिए या उन्हें बोलने के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए. अपितु मैं उन लोगों से स्वतः निवेदन करता हूँ कि आप अपनी भाषा का सम्मान करें और बोलें परन्तु हमारी भाषा को भी समझे. हिंदी हीं एक ऐसी भाषा है जो हमें देश के हर कोने में बोलने-सुनने को मिल जाती है. मैं हिंदी का उपासक हूँ क्योंकि मेरा परिवेश हिंदी भाषी लोगों से भरा पड़ा है. देश का हर पाँचवाँ देशवासी हिंदी बोलता है. तो हिंदी कितनी वृहद भाषा है इसका अंदाजा हमें सहज हीं लगा लेना चाहिए. देश के जितने भी हिंदी बोलने और लिखने वाले लोग हैं उन सभी को मेरी तरफ से "हिंदी दिवस" की हार्दिक बधाई. हिंदी का हमारे स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में बहुत अहम रोल रहा था तभी तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने साल 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने को कहा था. इसे गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था और गांधी जी ने ये भी कहा था कि हिंदी के बिना राष्ट्र गूंगा रहेगा. मैं अपने उन हिंदी के महान साधकों को नमन और प्रणाम करता हूँ जिन्होंने हिंदी भाषा को आम इंसान के जुबान की भाषा बनाने में अपना अतुल्यनीय योगदान दिया उनमें कालिदास से लेकर गोस्वामी तुलसीदास, मीरा, रसखान, कबीर, तानसेन, निराला, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, पंत और आधुनिक काल के लेखक और गायक/वाचक श्रेष्ठ है. 
  

Wednesday, September 11, 2019

गांधी के सत्याग्रह का जन्म भाग-1

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का नाम ले लेकर तो आज लाखों लोग ढोंग रचा रहें हैं और उनमें वो लोग भी शामिल है जिनके राजनैतिक बाप-दादा स्वंवतंतता के समय खुलेआम गाँधी जी की सत्याग्रह और आजादी के उनके प्रयासों का विरोध करते थे. उनमें सत्ताधारी को पीछे के दरवाजे से अपनी पूरी ताकत देने वाला संघ परिवार भी गाँधी जी की विरोध करने के मामले में अग्रिम पंक्ति में स्थान बनया था. परन्तु आज वक्त ने ऐसा पासा बदला कि जो 1948 तक बापू जी के विरोध में आगे खड़े रहते थे वो आज उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा किये बिना नहीं रहते. क्योंकि इसे गैर राजनीतिक संगठन को पता है कि आजादी के आंदोलनों के वक्त ऐसे संगठनों की भूमिका संदिग्ध रही है. जिनके अनेकों प्रमाणित दस्तावेज है. माफी मांगने से लेकर सेलुलर जेल तक. आजकल समाज में गांधी जी को अपशब्द कहने को लेकर एक नया चलन शुरू हो चुका है. कुछ सप्ताह पहले मध्य प्रदेश, भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर (आतंक की आरोपी) ने गांधी जी को खलनायक बताते हुए हत्यारे गोडसे की देशभक्त बोली थी. क्योंकि वो भी उसी तरह की देशभक्त हैं जिस तरह का देशभक्त गोडसे था. गोडसे राष्ट्रपिता का हत्यारा था और प्रज्ञा आतंक की आरोपी। तो उन्हें तो गोडसे प्यारा लगेगा ही.

बापू जी हमेशा हीं सत्य के पुजारी रहें है. जीवन पर्यन्त उन्होंने हमेशा सत्य की हीं बात की और उसी रास्ते पर चले. सत्याग्रह उसी का एक बहुत स्वर्णिम अध्याय है. सत्याग्रह के तीन अति महत्वपूर्ण कारक (तत्व) होते हैं, जिनमें 1.सत्य,2.अहिंसा और 3. साधन-शुद्धि। साधन और शुद्धि एक दूसरे की पूरक हैं. साधन में नैतिकता का विशेष ध्यान रखा जाता है क्योंकि इसके बिना आपका बाहरी स्वरूप कैसा भी पर आंतरिक स्वरूप सही नहीं है तो आपके द्वारा की गई चेष्टा निरर्थक हैं. सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ हीं 'सत्य के साथ चलना' होता है.
  • सत्य का आग्रह अर्थात सत्य को समेट लें या सत्य का हीं हो लिया जाए. जहां किसी तरह के शक की गुंजाइश हीं न बचे.  
  • सत्याग्रह में दूसरा स्थान अहिंसा का आता है जिसका मतलब होता है कि आप किसी को चोट नहीं पहुचायेंगे, चाहे वो शारीरिक हो या मानसिक। सत्याग्रही कभी भी किसी काम को छुपा कर करने में यकीन नहीं रखता अपितु उसे खुले तौर पर करता है.   
  • साधन नैतिकता का हीं एक उच्च विचार है जिसमें समस्त चुनौतियों से पार पाने की जुगत होती है और यथासंभव शक्ति के अनुरूप कार्य को अपने में ढाल लेती है.
सत्याग्रह का संक्षिप्त वर्णन - 

"सत्याग्रह" मतलब सत्य का आग्रह. इस विचार में गांधी जी कैसे ढले और पैसिव रेज़िस्टेंस शब्द से सत्याग्रह तक बापू जी कैसे पहुँचे, इसका इतिहास उन्होंने स्वयं लिखा है, 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास’ में जिस घटनाक्रम का विस्तार पूर्वक बताया गया है उसे एक बार दुबारा पढ़ने की आवश्यकता है. बापू जी ने लिखा है कि ‘‘ उस नाट्यशाला में सभा हुई. ट्रान्सवाल के भिन्न भिन्न शहरों से प्रतिनिधि भी बुलाये गये. पर मुझे स्वीकार करना चाहिए कि जो प्रस्ताव मैंने बनाये थे उनका पूरा अर्थ स्वयं मैं ही न समझ सका था. इसी प्रकार यह अंदाज भी न लगा सका था कि इनका दूरवर्ती परिणाम क्या होगा. सभा हुई. नाट्यशाला में कहीं भी जगह नहीं खाली बची. सबके चेहरे मानों यही कह रहे थे कि कोई नयी बात आज हमें करनी है.’’

गांधी जी आगे लिखते हैं कि - ‘‘ हम में से कोई भी इस बात को नहीं जानते थे कि कौम के इस निश्चय अथवा आंदोलन को किसी नाम से पुकारा जाय. उस समय मैंने इस आन्दोलन का नाम ‘पैसिव रैजिस्टेन्स’ रखा था. मैं उस समय पैसिव रेजिस्टेन्स का महत्त्व भी न तो जानता था और नसमझता ही था। मैं तो केवल यही जानता था कि एक नवीन वस्तु का जन्म हुआ है. पर जैसे-जैसे आन्दोलन बढ़ता गया वैसे–वैसे ‘पैसिव रेज़िस्न्स’ के नाम से घोटाला होने लगा और इस महान् युद्ध को एक अंग्रेजी नाम से पुकारना भी मुझे लज्जाजनक मालूम हुआ. दूसरे कौम को यह शब्द जल्दी याद होने लायक भी न था. इसलिए इस युद्ध के लिए सर्वोत्कृष्ट नाम ढूँढ़नेवाले के लिए मैंने ‘‘इण्डियन औपीनियन’’ में एक छोटे से इनाम की घोषणा की. उत्तर में कितने ही नाम आये. उस समय युद्ध के रहस्य की चर्चा ‘‘इम्डियन ओपीनियन’’ में अच्छी तरह हो चुकी थी. इसलिए उम्मीदवारों के लिए उस शब्द को ढूँढ़ने के लिए प्रमाण की कोई कमी न थी. मगनलाल गांधी ने भी इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया था. उन्होंने ‘ सदाग्रह’ नाम भेजा. इस शब्द को पसंद करने के लिए उन्होंने कारण बताते हुए लिखा था कि कौम का आन्दोलन एक भारी आग्रह है. और यह आग्रह ‘सद्’ अर्थात शुभ है। इसलिए उन्होंने इस नाम को इतना पसंद किया है. मैंने उनकी दलील का सार बहुत थोड़े में दिया है. मुझे यह नाम पसन्द तो आया तथापि मैं उसमें जिस वस्तु का समावेश करना चाहता था उसका समावेश उससे नहीं होता था. इसलिए मैंने उसके ‘द्’ को ‘त्’ बनाकर उसमें ‘य’ जोड़ दिया और ‘सत्याग्रह’ नाम तैयार कर लिया. सत्य के अन्दर शान्ति समाविष्ट मानकर किसी भी वस्तु के लिए आग्रह किया जाय तो उसमें से बल उत्पन्न होता है। इसलिए ‘‘आग्रह’’ के द्वारा उसमें "ब" का भी समावेश करके भारतीय आन्दोलन का नामाभिधान -‘सत्याग्रह’ अर्थात् सत्य और शान्ति से उत्पन्न होने वाला बल –करके उसका प्रयोग शुरू कर दिया. तब से इस युद्ध को ‘‘पैसिव रेज़िस्टेन्स’’ नाम से पुकारना बन्द कर दिया और यहाँ तक कि अँग्रेजी लेखों में भी कई बार पैसिव रेज़िस्टेन्स को छोड़कर सत्याग्रह अथवा उसी अर्थ के अन्य अँग्रेजी शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया. ‘सत्याग्रह’ के नाम से पुकारे जाने वाली वस्तु का और सत्याग्रह का जन्म इस तरह हुआ.’’


Tuesday, September 10, 2019

रिश्तों की कच्ची डोर

रिश्तों की डोर कितनी असहाय हो गयी है. इस तरह के किस्से-कहानियां तो हमने अक्सर अपनी छोटी सी जिंदगी में जरूर देखी-सुनी होंगी पर जब खुद के घर में कुछ इसी तरह की घटनाएं घटित होती हैं तो उसकी वास्तविक पीड़ा का अहसास होता है. मेरा हृदय किसी बुजुर्ग के साथ किये जाने वाले बर्ताव को लेकर बहुत दुखी होता है. वो चाहे मेरे माँ-बाप के साथ हो या मेरे दादा-दादी के साथ. मेरी पूरी जिंदगी मेरे ननिहाल में गुजरी और मेरे नाना जी क्षेत्र के सम्मानित सदस्य रहें हैं और प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्याक भी रहे. आज से लगभग 19 साल पहले वो सेवानिवृत्त हुए थे. मेरे घर के लगभग सभी सदस्य उच्च शिक्षा ग्रहण किये हुए हैं पर मेरा भी परिवार बुजुर्गों की तौहीन करने वाली संस्कृति से नहीं बच सका. आज मेरे नाना असहाय से रहते हैं, हालांकि उनके सेवा-टहल में कोई कमीं नहीं है फिर भी जो माली एक बाग़ में चार फूलों को खाद-पानी दे-देकर सींचता है और उसे दुनिया के सामने खुश्बू बिखेरने के काबिल बनाता हैं. जिससे की वो अपनी पहचान के साथ जी सके. परन्तु दुर्भाग्यवश जब उसी माली के साथ उसके जीवन के अंतिम पलों में एक दो फूल उस बगिया को भूलने की कोशिश करें या उस माली के मेहनत को दरकिनार करते हुए उससे अपनी पहचान को अलग कर ले तो कितना दुःख होता है, सामान्यतया उसका अंदाजा लगाना बहुत हीं मुश्किल काम लगता है  परन्तु जब उस माली की जगह अपने आपको खड़ा करके देखें तो उसकी ब्यथा को हम जरूर पढ़ सकते हैं. आज की समस्त युवा पीढ़ी से मेरा विनम्र अनुरोध है कि आप अपने बड़े-बुजुर्गों का अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा सम्मान करें क्योंकि उनके जीवन का अंतिम समय अगर ख़ुशी से बीतेगा तो आपका भविष्य उनकी दुआओं की वजह से तारों के समान चकदार होगा.


Saturday, September 7, 2019

इसरो के वैज्ञानिक बधाई के पात्र

इसरो के वैज्ञानिकों को सर्वपर्थम बधाई.

हमारे वैज्ञानिकों पर हमें नाज है कि वो हिन्द की औलाद है. हमारे इसरो के वैज्ञानिकों ने 13 साल के अथक प्रयासों से आज देश का हर नागरिक अभिभूत है और अपने सर को झुकाकर अपने महान वैज्ञानिकों को नमन कर रहा है. क्योकि आपने हमें आज मुस्कुराने का मौक़ा दिया है. क्या हुआ कि चंद्रयान-2 के रोवर की लैंडिंग चाँद के सतह पर नहीं कर सके और चाँद को चूमने से मात्र 2.1 किलोमीटर दूर रहा. लेकिन आपके अथक मेहनत को हम कैसे भूल सकते है, हमें आप के विवेक पर रंच मात्र भी संदेह नहीं है. हमें पूर्ण विश्वास है कि हम आज नहीं तो कल अपने सपने को जरूर जी लेंगे. आज देश का हर नागरिक आपके साथ कंधे से कंधा हीं नहीं बल्कि पूरे समर्पण के साथ खड़ा है. आपने इस मिशन को चंद्रयान-1 की सफलता (2008) के बाद अपनी योजना पर जब काम करना शुरू किया तो हमारे पास बहुत सी तकनीक का अभाव था जिसे आपने खुद अपने मेहनत के दम पर हासिल किया तो चंद्रयान को चाँद की जमीं पर उतारना अब कहाँ मुश्किल होने वाला है. जब आप धरती से 3 लाख 84 हजार 400 किमी दूरी पर चमकते उस चांद को स्पर्श कर लेने का सपना लिए, चांद की जमीन पर उतरने की जिद के साथ चल पड़े और बिलकुल नजदीक तक पहुंचने में सफल हो हीं गए है तो 2 किलोमीटर कुल दूरी का सौवां हिस्सा भी नहीं. तो वहां तक भी अब आप पहुंच सकते है इसमें हमें कोई संदेह नहीं है.

जय हिन्द
जय विज्ञान   

Thursday, September 5, 2019

शिक्षक सभ्य समाज का आईना

भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. क्योंकि राधाकृष्णनन जी राष्ट्रपति बनने से पहले पेशे से शिक्षक थे और एक शिक्षक के रूप में अपनी जिंदगी में 40 बहूमूल्य बरस देश को दिए थे. राधाकृष्ण जी का मत था कि समाज की कुरीतियों को दूर केवल शिक्षा के माध्यम से हीं किया जा सकता है. जिसके लिए उन्होंने अथक प्रयास भी किये। राधाकृष्णन जी का मानना था कि किसी मनुष्य की प्राथमिक शिक्षा उसके परिवार से शुरू होती है और विद्यालय में जाकर निखरती है. मेरे गुरु मेरे नाना स्वय रहे हैं क्योंकि वो भी पेशे से अध्यापक थे (अब पेंशनभोगी). उन्होंने मुझे बचपन से समाज और इसमें फ़ैली कुरीतियों को समझने और उन्हें दूर करने के गुर सिखाये थे. जो शब्दशः आज भी मुझे याद है. उनके बाद मै बलइपुर स्कूल में दाखिला लिया और इंद्रदेव पाल गुरु जी से नर्सरी (गदहिया) से शुरू किया. जहां मुझे नंदलाल, मोछू, पांचू, छोटेलाल इत्यादि गुरुजनों का सानिध्य मिला और जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी अन्य गुरुजनों का सानिध्य मिला. फिर 1995-1996 में मेरे गाँव मटियारी में सरकारी विद्यालय खुला जिसमें वहां के प्रधानाध्यापक श्री मखोदर यादव जी ने मेरे नाना से निवेदन किया कि मेरा दाखिला प्राइवेट स्कूल से निकाल कर सरकारी स्कूल में करा दें जिससे की गाव के दुसरे लोग भी अपने बच्चे को भेज सके. उनके अंदर भी सरकारी स्कूल को लेकर एक विश्वास पैदा हो. गुरु जी के आग्रह को मेरे नाना जी ने स्वीकार किया और मेरा दाखिला अपने गाँव के स्कूल में हो गया. वहां मैंने पढ़ाई पूरी करने के बाद छठी कक्षा के लिए कटहरी के सरकारी विद्यालय में दाखिला लिया. उसकी बाद 9 से 12 तक श्री नाल देव कुल देव इण्टर कालेज में रहा फिर स्नातक की पढ़ाई चक्के स्नातकोत्तर महाविद्यालय से पूरा किया.
आज शिक्षक दिवस के अलावा मेरे लिए दोहरी खुशी है. आज के हीं दिन मेरी जिंदगी में एक ऐसे फूल का उदय का उदय हुआ जो मेरी पूरी जिंदगी को बदल दिया और वो है मेरी बेटी इशू. जिसका जन्म आज की तारीख को सन 2013 में हुआ था. आज उस मेरी फूल सी मासूम गुड़िया का जन्मदिन है. इसलिए मेरे लिए शिक्षक दिवस और ख़ास हो जाता है क्योंकि मेरी बिटिया भी अब स्कूल जाती है और स्कूल के अपने अनुभवों को शाम को मेरे साथ साझा करती है.      

Tuesday, September 3, 2019

यातायात जुर्माने में बेतहाशा वृद्धि

1 सितंबर 2019 से देश में एक संशोधित "मोटर व्हीकल एक्ट" लागू किया गया है. इस मोटर व्हीकल एक्ट में गलत दिशा में गाड़ी चलाने, बिना हेलमेट गाड़ी चलाने, नाबालिग द्वारा गाड़ी चलाने, बिना लाइसेंस के गाड़ी चलाने अथवा अन्य तरह के जुर्माने की राशि को पांच गुना से दस तक बढ़ा दिया गया है. जहां तक मेरी समझ काम कर रही है वहां तक यह निर्णय जनता के लिए ठीक नहीं है. इससे पुलिसिया लूट-खसोट को बढ़ावा मिलेगा. मसलन पहले बिना ड्राइविंग लाइसेंस के गाड़ी चलाते हुए पकड़े जाने पर महज 500 रूपये का चालान अथवा अर्थदंड लगता था जिसे लोग गलती होने पर भर देते थे पर अब नए आदेश के बाद जुर्माने की राशि को बढ़ाकर 5000 रुपया कर दिया गया है. इसी तरह और तमाम जुर्मानों को बढ़ाया गया है. सरकार का कहना है कि जुर्माने की राशि बढ़ाने से लोग डरेंगे और यातायात नियमों का पालन करेंगे, परन्तु इसकी क्या गारंटी है कि लोग नियम के विरुद्ध काम नहीं करेंगे ? पहले भी तो क़ानून था जब भी लोग उसके खिलाफ जाते थे और जुर्माना भर देते थे. परन्तु नए आदेश के अनुसार वो 500 की जगह 5000 का जुर्माना कदापि न चुकाना चाहेंगे और नगद लेन-देन करके निकल जायेंगे. मुझे लगता है कि इस तरह का नियम बनाने वालों ने गांव या सुदूर के उस आम नागरिक के बारे में नहीं सोचा जिसे सोसायटी से खाद-बीज तो लाना होगा पर वो किसी कारण से अपना कोई कागज घर पर भूल गया होगा तो इस जुर्माने की राशि भरने के चक्कर में उसका खेती का काम अधूरा रह जाएगा. ऐसा लगता है कि यह नियम दक्षिण के मशहूर अभिनेता महेश जी की फील मो देखकर बनाया गया है. फिल्म के अंदर महेश बाबू मुख्यमंत्री होते हैं और सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए क़ानून में ठीक इसी प्रकार से भारी अर्थदण्ड का प्रावधान करते हैं और सारी सड़क दुर्घटनाएं रूक जाती है. शायद उसी कथानक को फ़िल्मी पर्दे से उठाकर जीवन-दर्शन पर अपनाने की सरकारी योजना है.