Wednesday, June 19, 2019

वन नेशन वन इलेक्शन आज अब्यवहारिक है

देश 1947 में आजाद हुआ था तो उस समय जाहिर सी बात है कि सभी राज्यों और केन्द्र के चुनाव एक साथ कराते जाते थे क्योंकि वो दौर राष्ट्र निर्माण का दौर था और दक्षिण के कुछेक राज्यों को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी। अलग-अलग चुनाव का सिलसिला आर्टिकल 356 के तहत कार्रवाई करने के बाद हुआ। जब किसी राज्य सरकार को बर्खास्त किया जाता है तो वहां आर्टिकल 356 का हीं प्रयोग किया जाता है। इसलिए जब कांग्रेस नित सरकार ने कुछ राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने की कोशिश की या लगाई जब से चुनाव के समय में परिवर्तन हुआ और आज ऐसा लगता है कि हर छ्ठे महीने चुनाव है। आर्टिकल 356 का उपयोग भाजपा/संघ की सरकार ने भी खूब किया है। उसका ताजा उदाहरण उत्तराखंड और अरूणांचल प्रदेश है जहां इन्होंने कांग्रेस की कार्यरत सरकार को 356 के माध्यम से बर्खास्त कर दिया था, खैर ये बात अलग है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की सिफारिश पर लगाए गए आर्टिकल 356 को निरस्त कर कांग्रेस की पुरानी सरकार को बहाल किया था।

एक देश एक चुनाव पर आगे बढ़ने का मतलब है कि आर्टिकल 356 को संविधान से हटा दिया जाय। ऐसा होने के बाद एक दूसरी स्थिति ये पैदा हो जायेगी की मानो किसी राज्य की सरकार विधानसभा के पटल पर अपना बहुमत को देती है और जो सरकार से निकले हुए विधायक हैं वो विपक्ष की तरफ भी नहीं जाते हैं तो ऐसी सूरत में केन्द्र सरकार क्या करेगी ? क्या बचे हुए वक्त तक वहां कोई चुनी हुई सरकार काम नहीं करेग ? करता केन्द्र अपनी कठपुतली उस राज्य की जनता पर ज़बरदस्ती थोप देगी और अपनी इच्छा अनुसार कार्य करेगी जैसा की कश्मीर में देखने को मिल रहा है। एक राष्ट्र एक चुनाव सुनने में तो अच्छा लग रहा है पर जब आप ब्यवहारिकता पर परखने की कोशिश करेंगे तो आपको इसमें तमाम खामियां नजर आयेंगी जो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का हनन करने वाली होंगी। 

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