Monday, April 29, 2019

चुनाव से जनता के मुद्दे गायब, आसनसोल में चुनाव के दौरान हिंसा

आज लोक सभा चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है अब तक करीब 15 फीसदी के आस-पास मतदान हो चुका है. परन्तु पश्चिम बंगाल के आसनसोल से सुबह-सुबह हिंसा की खबर आयी जो एक मजबूत लोकतंत्र की सेहत के लिए कत्तई सही नहीं कहा जा सकता। आसनसोल सीट से अभी केंद्र सरकार में मंत्री और मशहूर पार्श्व गायक श्री बाबुल सुप्रियो भाजपा की तरफ से उम्मीदवार हैं और दूसरी तरफ मुनमुन सेन जो की बांग्ला फिल्म इंडस्ट्री की जानी-मानी अदाकारा है और तृण मूल कांग्रेस की तरफ से उम्मीदवार हैं का मुकाबला आपस में हो रहा है. परन्तु सुबह किसी बात को लेकर दोनों पार्टियों के समर्थकों में झड़प हो गयी और पुलिस को लाठीचार्ज करके भीड़ को भगाना पड़ा और इसी बीच वहाँ पहुंचे बीजेपी उम्मीदवार बाबुल सुप्रियो के साथ भी हाथापाई की कोशिश की गयी. लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि दोनों पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इन हिंसाओं के बीच अपने-ापने समर्थकों से संयम बरतने की अपील तक नहीं की. इससे एक बात समझ में आती है कि कहीं न कहीं पार्टियों के शीर्ष नेता इस उग्र भीड़ को बढ़ावा दे रहें है.

चौथे चरण का मतदान हो रहा है परन्तु इस चरण तक आते-आते आम इंसान से जुड़े मुद्दे जैसे- रोजी, रोटी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी ये सब गायब हो गए और पुराने मुद्दों का भी कोई जिक्र नहीं हो रहा है. अब जिस बात का जिक्र हो रहा है उसमें जाति हम हो गयी है. हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी गुजरात में अगड़ी जाति (बनिया) से शुरू होते हुए 2019 आते-आते पिछड़ा बने और तो कन्नौज पहुंचते-पहुंचते महाशय अति-पिछड़ा बन गए हैं. जितनी गिरावट साहेब के जाति में हुई है उतनी गिरावट तो उनके उम्र में भी नहीं हुई है. राष्ट्रवाद और बालाकोट का समर्थन उनके उन्हीं समर्थकों में हैं जिन्होंने पिछली बार उनको वोट दिया था पर साहेब के प्रति विश्वास में उनके दिल में भी कमीं आयी है. क्योंकि जब भक्त भक्ति पर उतरते हैं तो निचे लिखा हुआ 2014 वाला कुछ वादा याद दिलाने मात्र से हीं खिसियाने लगते हैं.          

एह बार भाजपा के वोटवा काहें दें -

15 लाख देना जुमला
काला धन वापसी जुमला
राम मंदिर जुमला 
रुपया की मजबूती जुमला
स्मार्ट सिटी जुमला 
आदर्श गाँव जुमला
पाक को जवाब जुमला
किसानों की आय जुमला
2 करोड़ रोज़गार जुमला 

कुछौ ना मिलल शिवाय विवेक विहीन भक्तन के.

भक्तों के बीच में जब भ्रष्टाचार पर जब सवाल किया जाता है तो वो उखड़ जाते हैं और भारत माता की जय के नारे का ऊँची आवाज में जयकारा लगाते हैं और देशभक्त बन जाते हैं और मानते हैं कि जनता को छलने पाप एकमात्र नारे से सारे पाप धूल जाते हैं. जो पिपक्ष में नेता होता था उसे भाजपाई खूब गरियाते थे और सबसे बड़का भ्र्ष्ट बताते थे और जैसे हीं वो इनकी पार्टी में आये तो शाह रूप वाशिंग पाउडर और मोदी रुपी मशीन में धुलकर पक्का ईमानदार बन जाता है. उनमें से कुछ नाम मैं यहां वर्णित करना चाहता हूँ जैसे  विजय बहुगुणा, राय (नारदा-शारदा घोटाले के आरोपी), स्वामी प्रसाद मौर्या, रीता बहुगुणा जोशी, हरक सिंह रावत, पंडित सुखराम शर्मा, अनिल शर्मा (बाप-बेटे हिमांचल) जैसे मणि आज बीजेपी में जाते हीं माँ गंगा की तरह पवित्र हो चुके हैं जो दूसरी पार्टी में रहते हुए महाभ्रष्ट हुआ करते थे. इन सब मामलों का जिक्र करने के बाद भक्तो के पास उरी और बालाकोट की स्ट्राइक बचता है और सेखी बघारने के लिए मोदी-मोदी करते हैं फिर वहीं जब पलट कर ये पूछ लिया जाता है कि अगर इन स्ट्राइक का श्रेय मोदी जी को जाता है तो उरी में 21 जवान शहीद हुए और पुलवामा में 42 जवानों की निर्मम रूप से हत्या कर दी गयी तो उसकी भी जिम्मेदारी मोदी की क्यों नहीं होनी चाहिए. इतना सुनते हीं उनका मुंह फिर लटक जाता है और फिर देशद्रोही का शब्द बौखलाते हुए अपने मुंह से नकालते हैं और उनकी हताशा, निराशा का अंदाजा उस समय साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता है.    

Friday, April 26, 2019

बी एच यु गेट से कचहरी तक गोदी मीडिया मोदी के साथ

मीडिया को देखकर आज तरस आ रहा है कि कल शाम से इन्हें मोदी जे के अलावा कोई खबर नहीं मिली। क्या हो गया हैं इन मीडिया वालों को ? क्या इनकी अंतरात्मा इन्हें कभी नहीं झकझोरती होगी कि तुम्हारा काम क्या है और तुम कर क्या रहे हो ? कल शाम से देख रहा हूँ कि कुछेक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनल और प्रिंट मीडिया को छोड़कर अब तक लगातार मोदी जी की प्रसंशा में लगे हुए हैं. इन मीडिया वालों की नजर में अब केवल भाजपा और प्रधानमंत्री हीं देश हैं न कि देश की सवा अरब आबादी. मीडिया के गोदी मीडिया बनने की कहानी कल शाम को ६ बजे के आस-पास बी एच यु गेट से शुरू होती है जो लंका, सोनारपुर, मैदागिन, दशाश्वमेध घाट होते हुए आज कचहरी जिलाधिकारी कार्यालय तक पहुंचा और मोदी गुणगान में अब तक अनवरत लीं है और अपने धर्म का पालन कर रही है.

अगर चुनाव के संबंध में बात किया जाए तो मोदी जी का वाराणसी से जीतना दीवार पर साफ़-साफ़ अंकित है. जिसकी मुहर कल की भीड़ ने लगा दिया है. वैसे इस सीट पर बीजेपी के हारने का कोई सवाल हीं पैदा नहीं होता था, हां पर लड़ाई कल उस समय एकदम कमजोर पड़ गयी जब प्रधानमंत्री के सामने कांग्रेस ने पिंडरा क्षेत्र के पूर्व विधायक श्री अजय राय जी को मैदान में उतार दिया. इससे पहले देश के प्रतिष्ठित गोदी मीडिया चैनलों ने प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर खूब प्रचार किया और कांग्रेस भी कभी इस बात का खंडन नहीं किया था पर जब प्रियंका गाँधी का नाम वाराणसी संसदीय सीट के लिए चल रहा था तो सबको एक रोचक लड़ाई की उम्मीद थी और सबका अपना-अपना अनुमान था कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी से लड़ने आती हैं तो महागठबंधन अपना प्रत्याशी वापस ले लेगा पर प्रियंका के पीछे हटने का कारण ये भी हो सकता है कि सपा-बसपा गठबंधन पीछे हटने को मना कर दिया हो. बहरहाल अगर प्रियंका जी यहां से चुनाव लड़ती तो यह चुनाव निश्चित तौर पर रोचक होता क्योंकि जब २०१४ के चुनाव में केजरीवाल दिल्ली से यहां चुनाव लड़ने आये थे तो उन्हें १,७९,७३९ कांग्रेस के अजय राय ७५,००० सपा के कैलाश चौरसिया और बसपा के विजय जायसवाल को ५,०००० के करीब वोट मिले थे और मोदी जी को करीब ५,१६,५९३ वोट मिले थे जो अपने निकटम प्रतिद्वंद्वी केजरीवाल को ३,००००० से ज्यादा वोटों से हराया था. इसी का आंकलन करने से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि विपक्ष की तरफ से कोई एक उम्मीदवार आता जो बड़ा चेहरा भी होता तो वो मोदी जी को कड़ी टक्कर दे सकता था. काशी का यह चुनाव अब एक मात्र रस्म अदायगी भर रह गया है. कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय बेशक एक स्थानीय उम्मीदवार है पर उनका चेहरा इतना बड़ा नहीं है कि वो मोदी जी को हरा दे. हाँ अगर मोदी जी की जगह बीजीपी के तरफ से कोई सामान्य चेहरा होता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अजय राय जी अच्छी लड़ाई लड़ते और उनकी जीत की प्रबल भी संभावनाएं रहती. अब यह चुनाव खुल गया है और अब बस यह देखना है कि मोदी जी अपनी जीत के अंतर और कितना इजाफा कर पाते हैं. 

Wednesday, April 24, 2019

क्रिकेट के भगवान सचिन का जन्मदिन

आज उनका जन्मदिन है जिन्हें हम विश्व के क्रिकेट फैन कुछ इन नामों से जानते है क्रिकेट के भगवान, मास्टर-ब्लास्टर, सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर को उनके जन्मदिन पर ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि सचिन हीं एक मात्र ऐसी क्रिकेटर रहें हैं जिनके नाम के आगे उपनाम की एक लम्बी शृखंला जुडी हुई है. मैं भाग्यशाली रहा हूँ कि क्रिकेट के भगवान को टीवी पर खेलते देखा हूँ. हमारी आने वाली पीढ़ियां तो भगवान को बस यू-ट्यूब पर वीडियो में हीं खेलते हुए देख सकती है. मुझे अच्छे से याद है जब सचिन जी ने शेन वार्न की कुटाई की थी और अगले दिन उनका बयान समाचार पत्रों में छपा था उस समय मैं मात्र 11 साल था पर सचिन जी की वजह से क्रिकेट का जूनून सवार था और अच्छी समझ भी थी. 1997-1998 का वो दौर ऐसा था कि सचिन आउट हो जाते थे तो मैच भारत हार जाता था. बेशक उस टीम में गांगुली, अजहर, अजय जडेजा, रॉबिन सिंह जैसे बेहतरीन खिलाड़ी होते थे पर सारा मैच क्रिकेट के भगवान पर हीं निर्भर होता था. यह पोस्ट आज के हीं दिन सचिन जी के जन्मदिन पर उनके समर्पित करते हुए अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया था जिसे आज अपने ब्लॉग में सम्मिलित कर रहा हूँ. सचिन के बारे में और लिखने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है. अतः मैं सचिन के विशेषण के बारे में निचे लिख रहा हूँ कि विश्व की किस हस्ती ने सचिन के लिए क्या बोला है.           

1) इंडिया में आप प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं, पर सचिन पर उंगली नहीं उठा सकते: नवजोत सिंह सिद्धू

2) मैंने भगवान को देखा है, वह नंबर 4 भारत के लिए खेलता है: मैथ्यू हेडन

3) जब सचिन अच्छी बल्लेबाजी करते हैं तो भारत अच्छी तरह से सोता है: हर्षा भोगले

4) सर डॉन ब्रैडमैन ने सचिन के लिए कहा था कि मैंने जब सचिन को टेलीविजन पर बैटिंग करते हुए देखा, उनकी तकनीक से अचंभित हो गया. अपनी पत्नी को बुलाकर मैंने कहा की खुद की बल्लेबाजी तो मैंने देखी नहीं, लेकिन ऐसा लगता है मै भी इसी अंदाज से खेलता था. मेरी पत्नी टेलीविजन में देखकर बोलीं कि हां आप दोनों के खेलना का तरीका बिलकुल एक सा है.

5) अगर हम भारत में किसी हवाई जहाज पर सफर कर रहे हैं और सचिन साथ बैठे हैं तो हमारे साथ कोई बुरा हादसा नहीं हो सकता: हाशिम आमला

6) सचिन के बढ़िया फॉर्म की अवधि हमारे कुछ खिलाड़ियों की उम्र से भी ज्यादा है: डेनियल विटोरी

7) सचिन तेंदुलकर ने 21 साल तक देश का भार उठाया है. यह समय है कि हम उन्हें अपने कंधे पर उठाएं: विराट कोहली (2011 विश्व कप जीतने के बाद)

8) मुझे गैरी कर्स्टन को याद दिलाना पड़ता था कि वो सचिन के खिलाफ कवर्स पर फील्डिंग करने के लिए खड़े हैं, ताली बजाने के लिए नहीं: हंसी क्रोनिए

9) दुनिया में दो किस्म के बल्लेबाज हैं. पहला सचिन तेंदुलकर, दूसरा बाकी सब: एंडी फ्लावर

10) हम भारत नाम की एक टीम से नहीं हारे, हम सचिन नाम के एक आदमी से हार गए: मार्क टेलर

11) सचिन तेंदुलकर ने 1998 में शरजाह में शेन वॉर्न की गेंदों की ऐसी पिटाई की थी कि सचिन उनके सपने में नजर आने लगे थे और यह बात उन्होंने खुद बताई थी. उन्होंने कहा था कि ऐसा लगता है कि वह (सचिन) उनके सपने में भी छक्के लगा रहे हैं.

12) मैंने सचिन की बल्लेबाजी को देखने के लिए कई बार अपनी शूटिंग लेट की है: अमिताभ बच्चन

13) हमारे पास चैंपियन हैं, हमारे पास लैजेंड्स हैं, लेकिन हमारे पास कभी और कोई सचिन तेंदुलकर नहीं था और ना ही होगा: टाइम पत्रिका

14) अगर मेरे ग्रांड चिल्ड्रन ये याद नहीं रखेंगे कि मैंने एक दिवसीय और टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन बनाए हैं, तो वे निश्चित रूप से इस तथ्य को याद रखेंगे कि मैं सचिन तेंदुलकर के साथ खेला हूं: राहुल द्रविड़

15) सचिन को आउट कर आप आधी लड़ाई जीत जाते हैं: अर्जुन रणतुंगा

16) जब सचिन क्रीज पर होते तो मैं कभी थका महसूस नहीं करता: अंपायर रूडी कर्टजन

17) ऐसे खिलाड़ी से हारने में कोई शर्म नहीं है: स्टीव वॉ

18) मैं कहूंगा कि वह 99.5 प्रतिशत सही है: विवियन रिचर्ड्स

19) सचिन वो एकमात्र बल्लेबाज हैं, जिसे देखने के लिए मैं टिकट का भुगतान करके देखना चाहता हूं: ब्रायन लारा

20) कभी कोई दूसरा सचिन तेंदुलकर नहीं होगा: मुथैया मुरलीधरन

21) मैं भाग्यशाली हूं कि सचिन को मुझे केवल नेट पर ही गेंदबाजी करनी है: अनिल कुंबले

22) शिमला से दिल्ली तक ट्रेन में सफर के दौरान एक हॉल्ट था. ट्रेन सामान्य रूप से कुछ मिनटों तक रुक गई. सचिन सेंचुरी के करीब थे. वो 98 पर बल्लेबाजी कर रहे थे. यात्री, रेलवे अधिकारी हर कोई सचिन के शतक पूरा करने का इंतजार कर रहे थे. यह प्रतिभा भारत में समय रोक सकता है: पीटर रोबक (पूर्व इंग्लिश क्रिकेटर)

23) अपने सभी अपराधों को स्वीकार कर लीजिए, जब सचिन बल्लेबाजी करते हों. यहां तक कि किसी का भी ध्यान नहीं दिया जाएगा, क्योंकि भगवान भी उसे देख रहे होंगे: एससीजी पर एक प्लेकार्ड

24) क्रिकेट के लिए तेंदुलकर वो हैं, जो बास्केटबॉल के लिए माइकल जॉर्डन है और बॉक्सिंग के लिए मुहम्मद अली हैं: ब्रायन लारा

25) सचिन जैसे क्रिकेटर जीवनभर में एक बार आते हैं, और मुझे विशेषाधिकार प्राप्त हुआ कि वे मेरे समय में खेले: वसीम अकरम

Tuesday, April 23, 2019

चुनाव में सीटों के अपने-अपने दावे

राजनीति में अपने-अपने अंदाज का दौर शुरू हो चुका है जैसा कि हम सभी को पता है आज तीसरे दौर का मतदान देश के १५ राज्यों में चल रहा है. कहीं मतदान की रफ्तार सुस्त तो कहीं सरपट दौड़ रही है पर इनके बीच कयासों का दौर भी खूब चल रहा है कि फला दौर में फला की इतनी सीटें आयी फला ने बढ़त बनाई वगैरह-वगैरह। परन्तु इन सब के बीच जनता की कोई नहीं सुन पा रहा है कि जमीन पर निचले पायदान का आदमी जो चमक-दमक और गोदी मीडिया की पहुंच से दूर गांव में वो क्या चाहता है वो किसे जिताना चाहता है. मै २ अप्रैल  को ट्रैन से रायबरेली, फैजाबाद होते हुए अपने गृह नगर जौनपुर गया था वहां से वाराणसी जाने का भी अवसर मिला तो लोगों से रास्ते में बात करने पर एक बात का तो चला कि जनता के बीच में मोदी और भाजपा के लिए २०१४ वाली बात नहीं है. जनता सपा और बसपा के गठबंधन के बाद दो खेमों में अंदर-अंदर बट चुकी है. जमीन का हाल मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे भ्रामक प्रचार से कहीं ज्यादा सत्ता पक्ष के लिए डराने वाला है. गांव, गरीब, किसान को इस सरकार से सबसे बड़ी नाराजगी आवारा छुट्टा पशुओं को लेकर सरकार की बेरूखी से है. मेरे अपने गांव की मैं बात करना चाह रहा हूँ जहां के अधिकतर वोटर बीजेपी को वोट करते थे वो भी इस बार इन छूटता पशुओं की वजह से नाराज चल रहे है. गांव के हीं एक गिरि परिवार जो कि त्रिलोचन महादेव के मंदिर के पुजारी है उन्होंने ३ एकड़ में गेहूं के खेती की थी और सारा गेहूं सांड चर गए और वहां मैं भी देखा तो ७-८ की संख्या में सांड और बछिया थी जो सभी फसलों का मर्दन कर के रख दिया। जब उनसे बात किया तो उनकी बैठा देखकर जी भर आया और उनसे मेरी दो दिन पहले बात हुई तो बोले की मात्र एक कुंटल गेहूं की पैदावार हुई है जो की पिछले साल २०-२२ कुंटल के आस-पास था. तो इनके जैसे करोंड़ो किसान देश के ग्रामीणांचल में बसे हुए हैं जो इन तरह की समस्याओं के साथ दिन-ब-दिन दो चार हो रहे हैं. दूसरी वजह देहात में ये है कि उत्तर-प्रदेश में योगी जी के आने के बाद अगणी और पिछणी जातियों में टकराव दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है मुजफ्फरनगर में भीम आर्मी और गाँव वालों का संघर्ष इसी का एक उदाहरण था. जो लोग कहते हैं कि इस बार चुनाव में जात-पात और धर्म का भेद-भाव भुलाकर लोग वोट कर रहे हैं तो वो या तो सनक से भरे हैं या अति-उत्साह में वो जमीन की बात को अनदेखा कर रहे हैं. महागठबंधन की वजह से पिछड़े समाज के एक खास जाति और अनुसूचित जाति का वोट एक साथ जुड़ गया है और साथ में मुस्लिमों वोटों का जगह-जगह पर गठबंधन के साथ खड़े होने से इनकी ताकत में और इजाफा कर रहा है. जमीन हालात यह है कि अगर यह चुनाव ईवीएम के छेड़-छाड़ के बिना ईमानदारी से लड़ा जाए तो बीजेपी को १५ से २५ सीटें हीं मिल सकती है और गठबंधन को आसानी से ४० से ५० सीटें हासिल होती हुई दिख रही है और बात कांग्रेस की तो वो अपने खाते में बमुश्किल ४ सीट और जोड़ सकती है. जो लोग इस हकीकत को नहीं मान रहे हैं वो २३ मई को मान जाएंगे कि उत्तर-प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन बहुत अच्छा काम कर रहा है. बहरहाल एक स्वस्थ्य लोकतंत्र का ज़िंदा रहना हीं एक आम आदमी के अधिकारों का ज़िंदा होना है. 


Saturday, April 20, 2019

संघ स्वदेशी छोड़ विदेशी पूँजी की हिमायती बनी

स्वदेशी की बात करते-करते आरएसएस आज कहाँ तक पहुंची है उसे समझदार लोग आसानी से समझ सकते है. १९२५ से आरएसएस के भीतर जिस तरह की ट्रेनिंग दी जाती थी उसमें अर्थब्यवस्था के लिए स्वदेशी का जिक्र बार-बार होता था. परन्तु अब जब संघ सत्ता में अपरोक्ष रूप से भागीदार है तो उसकी नीतियां उसके पूर्व के प्रशिक्षण के ठीक उलट है. उदाहरण के लिए हम FDI को ही ले ले. जिस FDI निति को लेकर संघ पूर्व की कांग्रेस की सरकार पर हमलावर रहती थी वही आज बिलकुल खामोश सी रहती है तो सोचना चाहिए कि आखिर संघ की क्या मजबूरी है जो शांत हो कर पूर्व की सरकार से सौ गुना ज्यादा रफ्तार से बाजार के विदेशी करण की तरफ भाग रही है तो उसका बस कारण है कि संघ को समझ आ गया है कि अगर जनता के आकांक्षाओं को पूरा करना है, नौकरियों की संख्या बढ़ानी है तो कांग्रेस सरकार सरकार की कितियों के सहारे हीं खुद को आगे बढ़ाना होगा। क्योंकि स्वदेशी सामान का उत्पादन करने पर मेहनताना और खर्च ज्यादा बढ़ जाता है और मुनाफ़ा कम होता है. इसलिए संघ और संघ समर्पित संगठनों ने इस मोदी सरकार के आने के बाद स्वदेशी का झंडाबरदारी छोड़ कर चुप-चाप मौन होकर पूर्व की सरकार की नीतियों को स्वीकार रहे है. निःसंकोच कांग्रेस सत्ता में ज्यादा दिनों तक रही है तो जबाब और जिम्मेदारी उनकी ज्यादा बनती थी. जभी १९९१ में नरसिम्हा राव की सरकार ने भारतीय बाजार को विश्व के हवाले कर दिया. जिसके बाद भारतीय बाजर पूरी तरह से विश्व ब्यापार के लिए खुल गया पर स्वदेशी की बात करने वाली संघ के पृष्ठ भूमि से जो दोनों सरकारें बनी चाहे अटल जी (११९९-२००४) या अब मोदी जी (२०१४-२०१९) तक दोनों ने संघ के स्वदेशी एजेंडे पर न चलकर उसी कांग्रेस के आर्थिक एजेंडे पर आगे बढ़े और बहुत रफ्तार से बढ़ते चले गए. वर्तमान सरकार ने तो FDI को किसी-किसी क्षेत्र में १००% तक विदेशी निवेश के लिए खोल दिया.

प्रभात पटनायक का लेख पढ़ा पर उसमें एक बहुत हीं शानदार बात का जिक्र किया है जो अत्यंत मार्मिक है -
"कमला नेहरू स्विस सेनोटेरियम में टिपोक्लोसिस से उनकी मौत हुई थी उस समय नेहरू के पैसा नहीं था कि अपनी मृत पत्नी को देखने जा सके. उस समय जे डी बिड़ला ने नेहरू जी को पैसा देने का प्रस्ताव दिया था कि मैं आपको पैसा दे रहा हूँ और आप अपनी पत्नी को देखने स्विट्जरलैंड चले जाओ जिसे नेहरू ने मना कर दिया और कह सकते है कि क्राउड फंडिंग के पैसे जुटाए फिर अपनी मृत पत्नी को देखने स्विस सेनोटेरियम गए थे."

इसका मतलब ये नहीं था कि नेहरू जी के पास पैसा नहीं था पर नेहरू जी की कांग्रेस में गोखले जी और गांधी जी के देखरेख में ट्रेनिंग इस प्रकार से हुई थी कि जे डी बिड़ला द्वारा दिया जाने वाला पैसा उस संस्कार को धूमिल कर रहा था. गोखले जी कांग्रेस को बहुत अच्छी तरह से जानते और समझते थे तभी जब महात्मा गांधी जी दक्षिण अफ्रिका से देश लौटे थे तो गोखले जी ने गांधी जी से कहा था कि अगर तुम्हें हिन्दुस्तान को समझना है तो तुम्हें गाँव में जाना होगा. उनके बीच रहकर उनकी जीवन का जीना होगा, उनके दुःख-दर्द को मह्शूश करना होगा, दर्द सहना होगा जभी आप अच्छे तरिके से हिन्दुस्तान को जान पाओगे. उसके बाद हीं महात्मा गांधी जी चम्पारण समेत देश के अनेक गाँव वाले हिस्से का दौरा किया था और तब जाकर उन्होंने एक जाति-धर्म, भेद-भाव रहित समाज की कल्पना करने का विचार मन में आया और उसी पथ पर बाद में अग्रसर होते चले गए. अब की में एक भाव आया है कि मुझसे बलवान कोई नहीं है क्योंकि १९४८ में आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को लेकर  स्वयं सेवकों के मन में टीस छिपे तौर पर आज भी है. आगे चलकर इनकी सोच ये है कि २०१९ के बाद संघ सत्ता को उस स्थिति में ला देने की जरूरत है जहां किसी भी पार्टी संगठन को भी प्रतिबंधित कर सके. अब आप अगर थोड़ा सा गहराई से अध्ययन करेंगे तो पाएंगे संविधान के साथ-साथ एक नई सत्ता उभर कर आ रही है जो कुछ भी कर दे उसका कोई कुछ भी नुकसान नहीं कर पायेगा. उदाहरण के तौर पर जहां-जहां संघ की सत्ता में भागीदारी हैं वहीं क्यों गाय माता के नाम पर हिंसा सबसे ज्यादा हुई. अगर हुई तो उन पर कोई कार्यवाई क्यों नहीं हुई ? ये सब उसी समकक्ष चल रही सत्ता का असर है. हिंदी भाषी क्षेत्रों में हम गौ माता को पूजनीय मानते है इसलिए यहां भावनाओं को भड़काना आसान है परन्तु जब संघ की सत्ता गोवा, मणिपुर, मेघालय, असम, त्रिपुरा, इत्यादि में है तो वहां गौ मांस भक्षण करने वालों के साथ संघ खड़ी है क्योंकि वहां सत्ता को खोने का डर है. उदाहरण के तौर पर मेघालय से आने वाले उनके गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने खुलेआम मीडिया में कहा कि मैं बीफ खता हूँ कोई मेरे क्या कर लेगा. उनके इस बयान के बाद भी संघ मंडली उनका मुंह भर देखती रही. तो हम नागरिको को ये देखने और समझने की जरूरत है कि संघ पिछले दरवाजे से सत्ता को कंट्रोल करने के लिए बेचैन है और मुखौटे के रूप में बीजेपी को सामने रखी हुई है.        

Friday, April 19, 2019

राजनीति जो न सो करा दे माया-मुलायम

आज के दौर में राजनीति लोगों के निष्ठा को ऐसे तोड़ रही हो जैसे कोई इंसान किसी काँच के बर्तन को तोड़ता है. जब इंसान काँच तो तोड़ता है तो उसे यह बोध जरूर होता है कि ये जब टूट कर बिखर तब फिर से जुड़ नहीं पायेगा फिर भी वो तोड़ता है. ठीक उसी प्रकार का चरित्र आज के राजनेताओं (दलबदलू कहूँ तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए) का हो गया है. उदाहरण के तौर पर आज वो सपा का है तो कल वो भाजपा का भी हो सकता है, परसों बसपा का भी हो सकता है आगे चलकर वो कांग्रेस का भी हो सकता है. तो इनकी निष्ठा इतनी तेज बदल रही है जितनी तेज गिरगिट का भी नहीं बदलता होगा. आज की राजनीति विचारों की नहीं दलबदल पर आधारित हो चुकी है. कभी-कभी तो आश्चर्य होता है कि कल जो नेता अपने विरोधी की घोर और कठोर शब्दों में भर्तस्ना कर रहा होता है यही नेता मात्र कुछ हीं घंटों के उपरान्त उसी विरोधी पार्टी को अपना लेता है. तो हमें समझ लेना चाहिए आज राजनीति जनता की उसूलों के लिए नहीं बल्कि निजी स्वार्थ के लिए होने लगी है. इस लिए आप किसी भी पार्टी के भक्त न बनें. विवेकशील और धीर बने रहे.

हाल के दो-तीन सालों में कुछ ऐसे धुर-विरोधी दल राजीतिक मजबूरियों के कारण एक साथ आये जो सत्ता सुख का रस-पान भी किया. ये कभी एक नदी के दो छोर हुआ करते थे -

बिहार : राजद+आरजेडी+कांग्रेस
जम्मू-कश्मीर : बीजेपी+पीडीपी
उत्तर प्रदेश : सपा+बसपा 

आज लगभग ढाई दशक 26 साल बाद उत्तर प्रदेश का मैनपुरी जिला एक ऐतिहासिक घटना का गवाह बना जब 2019 लोकसभा चुनाव के लिए सपा और बसपा की एक संयुक्त रैली का आयोजन किया गया और उस रैली में 1996 के बाद पहली बार उत्तर प्रदेश की राजनीति के दो पुरोधा और हाल के दिनों में एक-दुसरे के धूर विरोधी नेता सपा संरक्षक माननीय श्री मुलायम सिंह यादव और बसपा अध्यक्ष बहन कुमारी मायावती जी एक साथ सार्वजनिक मंच को साझा किया. यह ऐतिहासिक इसलिए है कि 1996 के गेस्ट हॉउस काण्ड के बाद दोनों नेता एक दुसरे का चेहरा देखना पसंद नहीं करते थे. गेस्ट हॉउस काण्ड में मायावती ने मुलायम सिंह और उनकी पार्टी पर लड़ाई और खुद (मायावती) के कपड़े फाड़ने का आरोप लगाती रहीं हैं. लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि जिस पर आरोप लगा था और जिसने आरोप लगाया था वो दोनों जनता की अदालत में एक साथ एक मंच पर थे. रोचक बात तो ये है कि मायावती जी ने मुलायम सिंह के लिए वोट मांगा और जनता से नेता जी को भारी से भारी मतों से जिताने की अपील की. लगे हाथ मायावती जी ने मुलायम जी को उत्तर प्रदेश पिछड़े वर्ग का सबसे बड़ा नेता बता डाला। अब वो लोग जो एक नेता के साथ और एक के खिलाफ 1996 में खड़े हुए होंगे तो क्या वे इतनी जल्दी अपने साथ हुए राजनितिक बदले की भावना को भूल चुके होंगे अगर नहीं भूले होंगे तो क्या सोच रहे होंगे ? जो गेस्ट हॉउस काण्ड का सजीव गवाह रहा होगा उसकी अब मनोस्थिति क्या होगी मैं समझ सकता हूँ. उदाहरण के तौर पर शिवपाल सिंह यादव को हीं ले लो वही इस काण्ड के सबसे बदनाम किरदार बन कर उभरे थे. आज वो कहाँ हैं, किस स्थिति में हैं सब आप के सामने है. इसीलिए मैंने इस लेख का शीर्षक "राजनीति जो न सो करा दे माया-मुलायम " रखा है. इस कलयुग में हमारे सामने यह एक तरह का दुर्लभ उदाहरण है जहां आरोपी और आरोप लगाने वाली दोनों एक साथ एक मंच पर खड़े है. यह हमारे भारतीय राजनीति में हीं हो सकता है अन्यथा दुनियाँ में कहीं भी आपको ऐसा मनोरंजक उदाहरण देखने को नहीं मिलेगा. 


चित्र स्थल : मैनपुरी सपा, बसपा की संयुक्त रैली
स्रोत : आज तक हिंदी
दिनांक : 19.04.2019 

Thursday, April 18, 2019

आतंक की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर भोपाल से भाजपा की लोकसभा उम्मीदवार

अब हमारे इस महान देश में कोई आतंकी/ आतंकवाद का आरोपी भी चुनाव लड़ ले तो हमारी जनता को हतप्रभ नहीं होना चाहिए। मुझे तो साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी को देखकर ऐसा लगता है कि अगर आज अफजल गुरु ज़िंदा होता तो पीडीपी उसे भी चुनाव लड़ा देती और यही कहती कि जब साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी दे सकती है तो मैं अफजल को क्यों नहीं ? क्योंकि दोनों में एक समानता है अफजल जिस पर की 2004 संसद पर आतंकवादी हमले में हाथ था (जिसे आतंकी मानते हुए अब फांसी दी जा चुकी है) और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर भी मालेगांव में आतंकवादी हमले और बम ब्लास्ट में शामिल होने का आरोप है जिसमें ६ लोगों की मौत हुई थी और 101 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे. इसी केस में NIA की अदालत ने कुछ मामलो को ख़ारिज करते हुए हत्या के तहत मामला चलाने की मंजूरी दी है और इस समय साध्वी जमानत पर है. हमारे लोकतंत्र का और कितना उपहास उड़ेगा अब से पहला देखा जा रहा था कि हत्या, लूट और बलात्कार के आरोपी चुनाव लड़ते थे और अगर जीत जाते थे तो विधान सभा और संसद तक पहुंच जाते थे पर अब तो आतंक के आरोपी भी चुनाव लड़ना शुरू कर दिया है सबसे दुःख की बात ये है कि अपने आप को देश के सबसे राष्ट्रभक्त पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी बीजेपी ने आतंक के आरोपी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मध्य प्रदेश के भोपाल से अपना उम्मीदवार बनाया है. देश के संभ्रांत लोगों को इस तरह की नाजायज फैसलों के खिलाफ अपनी आवाज चाहिए नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब चोर, हत्यारे, भ्रष्टाचारी, बलात्कारी के बाद आतंकवादी भी माननीय बन कर संसद में जाने लगेंगे और हमारे भविष्य का फैसला करने लगेंगे। अच्छा हुआ कि अफजल गुरु को उसके अंतिम अंजाम तक पहुंचा दिया वरना वो दिन दूर नहीं होता जब वो भी साध्वी की तरह किसी पार्टी का उम्मीदवार होता और चुनाव लड़ता। हे भगवान आप हमारे देश की सज्जन जनता को इन आतंकी/ हत्यारे माननीयों से बचाएं। 

Tuesday, April 16, 2019

सतपाल सत्ती और आजम की भाषा

आप किसी ब्यक्ति विशेष, महिला विशेष से नाराज हो सकते है, उसकी बातों से असहमत हो सकते हैं, हो सकता है आप उसे नापसंद करते हो पर इसका ये कत्तई मतलब नहीं है कि आप उन्हें गाली दें. राजनीति में भाषा का रसातल में जाना एक हमारे समाज के लिए एक धब्बा है दो दिनों में एक आजम खान ने जया प्रदा के बारे में अत्यंत घटिया शब्द का प्रयोग किया और दूसरा मामला हिमाचल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ने राहुल गांधी की माँ का बाकायदा नाम लेकर खुले मंच से गाली दिया। इसे अविलम्ब रोकना चाहिए अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब भाषा भी हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद के लड़ाई की तरह और समाज में विद्वेष फैलाने के लिए दिमागी रूप से खाली नेताओं के मुंह से निकलने लगेगी और समाज में अपना एक अहम स्थान बना लेगी। जैसे आज के दौरे में देखा जा रहा है कि जो हत्या, बलात्कार, साम्प्रदायिक सौहार्द तोड़ने में और मुकदमों की लिस्ट में जितना ऊपर है वो उतना ही सम्मानित नेता है ठीक उसी तर्ज पर यह देखकर उनका आंकलन किया जाएगा कि वो कितनी बार किसे माँ-बहन की गाली दिया है, कितनी बार किसका अंडरवेअर देखा है. मेरी समाज के सभी लोगों से चाहे वो किसी भी पार्टी के पक्ष या समर्थन में हो ऐसे लोगों का साथ कत्तई न दें. क्योंकि जब आप एक समाज के रूप में इनका बहिष्कार करने लगेंगे जब इनकी औकात शून्य हो जायेगी तो दूसरे लोग इनसे सबक लेंगे और इस तरह की भाषाओँ का प्रयोग करने से बचेंगे.

कल राजनितिक दलों की तरफ से देश में दो घटनाएं हुई हैं जो अत्यंत निंदनीय है और इनकी जितनी निंदा की जाए उतना कम है. पहली घटना राम पुर से सपा के लोकसभा प्रत्याशी आजम खान की तरफ से हुई जो एक महिला और भाजपा प्रत्याशी जया प्रदा के खिलाफ घोर आपत्ति जनक बयान दिया, आजम ने अपने रैली में भाषण देते हुए कहा कि "उन्हें मैं 19 दिनों में हीं पहचान गया हूँ और तो और उनका अंडरवेयर भी खाकी रंग है." इस तरह का बयान एक महिला के लिए अत्यंत अशोभनीय और अक्षम्य अपराध है. चुनाव आयोग को तो आजम को जेल में डाल  देना चाहिए था न कि 72 घंटे का चुनावी रैली पर पाबंदी. इस बयान पर उनकी पार्टी और खुद आजम की काफी मजम्मत हुई फिर भी नेता अपने थेथरपन से बाज नहीं आ रहे हैं. 

दूसरी घटना देवभूमि हिमांचल में घटी जहां दोनों जगह केंद और हिमाचल में सत्तासीन और हिमाचल बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ने अपने पब्लिक रैली में खुलेआम हजारों लोगों को सामने कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी जी की माँ को गाली दी और ऐसी भाषा का प्रयोग किया कि न तो मैं इसे यहां लिखने की साहस कर पा रहा हूँ और न हीं सोचने का. कभी आपने सोचा है कि जब कोई जिम्मेदार ब्यक्ति इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है तो उसका निचे धरातल पर क्या असर पड़ता है. अभी तक राजनीति में सिर्फ माँ बहन की गाली बची थी अब वो भी बीजेपी के शीर्ष नेताओं की से शुरू हो गयी है. जो आगे चलकर इनकी शाखा में एक अहम अध्याय के रूप में शामिल कर लिया जायेगा और फिर उसी तरह की ट्रेनिंग दी जायेगी जैसी ट्रेनिंग ये अपनी शाखा में ईसाई और मुसलामानों को देशद्रोही बताने में करते हैं. जैसे ये कांग्रेस से उसके 70 सालों का हिसाब मांगते हैं वैसे हीं ये इसका भी हिसाब मांगेगे कि 70 सालों में माँ -बहन की गाली क्यों नहीं दी गयी इससे देश का विकास रूका हुआ था और इसके लिए नेहरू जिम्मेदार है. इस पर दलाल मीडिया और लंठ भक्त ताली पीटेंगे. जब आजम ने बीजेपी नेत्री के खिलाफ इस तरह का आपत्तिजनक बयान दिया तब देश के सभी मुख्य इलेक्ट्रानिक मीडिया और बीजेपी के भक्त समर्थक मय नेता के आजम को बहुत भला बुरा कहा और उनका गुस्सा जायज भी था पर जैसे हीं सतपाल सत्ती ने इस तरह की शर्मनाक हरकत की तो इनका गुस्सा कहा चला गया. जया मामले में विदेश मंत्री सुषमा जी ने भी मुलायम पर चुप्पी तोड़ने की नसीहत दे रही थी पर अपने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पर उन्हें भी सांप सूंघ गया है. ऐसी भाषा उनके नीच प्रवृत्ति का होने का परिचय देती है.अब कोई भाजपाई चौकीदार कुछ नहीं बोल रहा है अब आप जनता को हीं सोचना होगा कि क्या आप एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं कि आपके सामने आपके बेटे, बेटियां एक-दुसरे को फूहड़ गाली दे बात करें. आजम खान और सतपाल सिंह सत्ती दोनों ने देवी स्वरूप स्त्री का अपमान किया है दुःख और तब बढ़ जाता है जब लड़कियों को देवी मानने का ढोंग और हमारी सनातन हिन्दू की बात करने वाली पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष एक महिला के बारे में घोर आपत्तिजनक शब्द बोलता है जो वो पुरुष होकर भी कभी अपने बारे में सुनने की हिम्मत नहीं कर सकता। अपने प्रदेश अध्यक्ष के बयान पर संघ/बीजेपी मौन साधकर उन्हें उनके इस हरकत की स्वीकृति तो नहीं दे रहें हैं.  

Monday, April 15, 2019

रामनवमी की रात हरिद्वार की यात्रा

जैसा कि शनिवार के दिन रामनवमी थी और मैं अपने आफिस के कायों में ब्यस्त था. शाम को लगभग साढ़े 7 बजे मैं अपने घर पर पहुँचा चाय पिया और IPL का आनंद उठा रहा था जभी अचानक कुलदीप का फ़ोन आया कि दीपू चाचा गाजियाबाद आये हुए हैं और उनसे मिलने के लिए बाहर सड़क पर आओ. मुझे उनके आने पर कोई हैरानी नहीं हुई क्योंकि चाचा आते रहते हैं क्योंकि वो उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे में कार्यरत है तो मुजफ्फर नगर में चुनावी ड्यूटी में आये थे. खैर मैं उनसे मिला फिर अचानक कुलदीप ने कहा कि चाचा हरिद्वार चलने के लिए कह रहें हैं और आप भी चलोगे तो मुझे यकीन नहीं हुआ फिर चाचा ने कहा कि सच में हरिद्वार चलना है और माँ गंगा में नहाकर पाप धोना है फिर मैं मजाक में बोला फिर तो माँ गंगा मैली हो जायेगी बजाय पाप धोने के हम माँ को साफ़ और पवित्र बनायें। मजाक यहीं खत्म हुआ लेकिन मेरे सामने ये परेशानी थी कि अगले दिन यानी रविवार 15 अप्रैल को आधा ऑफिस खुला हुआ था तो मैंने अपनी परेशानी चाचा जी को बताई फिर भी उन्होंने कहा कि तुम्हे (मुझे) चलना होगा फिर हर तरफ से सोच समझकर मैंने एक कैलकुलेटेड रिस्क लेने की हिम्मत किया और बात कल के लिए छोड़ दिया। रूपक त्यागी घर गाड़ी लेकर आये और रात 12 बजे के आस-पास मैं और कुलदीप (केडी) अपने घर से सेवानगर दीपू चाचा को लेने के लिए वो महाशय अभी आता हूँ, अभी आता हूँ कह-कह कर 1 घंटे लगा दिए जब हम तीनों मैं, केडी, रूपक भैया जहां रुके थे उस गली में उनको लेने जाने लगे तो वो आते हुए दिखे फिर वहां से निकल कर रूपक के घर पहुचें अंततः 2 बजे के बाद हम हरिद्वार के लिए निकले। रास्ते में हंसी-मजाक और मस्ती और जगह-जगह रूकते हुए हम सुबह साढ़े 6 बजे हरिद्वार पहुंचे फिर ये निर्णय लिया गया कि अब चलना कहाँ हैं ? अब तक केडी गाड़ी चला रहे थे. फिर एकमत से ये तय हुआ कि हम सबसे पहले ऋषिकेष चलेंगे और हम वहां से हम अपने गंतब्य स्थान के लिए प्रस्थान कर चुके थे. गाड़ी में धीरे-धीरे सन्नाटा हो गया था चूँकि मैं कार की आगे वाली सीट पर बैठा था और अब रूपक भैया बोले देखो यार लोग शांत कैसे हैं मैं पीछे मुड़ के देखा था तो सिपाही (दीपू चाचा) और केडी चीयर निद्रा में लीं हैं आवाज देने के बाद भी उनके स्तिथि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ फिर हम दोनों आपस में बात करते हुए रास्ता काट रहे थे और ऋषिकेष पहुंचते हीं विचार बना कि भगवान नीलकंठ के दर्शन करने को ऊपर पहाड़ पर चलते हैं तो गाड़ी उस और मोड़ दी गयी और रास्ते में जब पहाड़ियाँ और नदियाँ दिखी तो मानो दिल हर्षित हो गया और ऐसा लगा कि दिल कह रहा हो कि अब यहीं हमेशा-हमेशा के लिया रूक जाए. जब चाचा को जगाया तो वो अति प्रसन्न हुए और गाड़ी रुकवा कर निचे उत्तर गए और वहाँ की खूबसूरती को कौतूहल भरी नजरों से निहारने लगे और सहसा बोल उठे यार क्या जगह है ? अब तक मैं यहां आने से महरूम कैसे रहा ? आजकल सेल्फी का जमाना चल रहा है तो वहां हमने सेल्फी लिया और ऊपर की तरफ लगातार चलते जा रहे थे और इसी तरह के मनमोहक दृश्य एक के बाद एक उभर कर सामने आ रहे थे जिनको देखने के बाद मन तनाव मुक्त हो जाता था. धीरे-धीरे हम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते गए और नीलकंठ की पहाड़ी पर जा पहुंचे। वहां पहुंचने के बाद हम लोग स्नान-ध्यान किया और बाबा के दर्शन के बाद हमने कुछ फोटो खींचे फिर वहां से अगले स्थान के लिए निकले फिर वापस हम हरिद्वार वापस आये वहां खाना-पीना हुआ. अब हमारा अंतिम था हम हरकी पैड़ी पहुंच चुके थे फिर हम सबने गंगा जी में घंटे भर डूबकी लगाई और पानी इतना शीतल था कि हाथ लगाना भी भारी पड़ रहा था. रविवार छुट्टी का दिन होने के नाते हरकी पैड़ी पर लोगों की बहुत भीड़ थी तो उनको नहाता देख हम भी पानी में उतरे नहाने के बाद हम 3 बजे दोपहर में हरिद्वार से वापस घर के लिए निकले और पुराने बस अड्डे पर भोजन करते हुए रात साढ़े 10 बजे अपने घर को सकुशल सभी लोग पहुंच चुके थे. इस यात्रा का अनुभव अनुत्तरित करने वाला रहा है और फिर से जाने की इच्छा जागृति हो रही है.       

Saturday, April 13, 2019

चैत्र की राम नवमी और गाँव की याद

आज देश में चईत (चैत्र) राम नवमी की पूजा बड़े धूम-धाम से की जा रही है. हमारे हिन्दू समाज में राम नवमीं का बहुत हीं बड़ा महत्व है. आज के हीं दिन अयोध्या (अवध) के राजा चक्रवर्ती सम्राट महाराज दशरथ जी के घर एक नन्हें से बालक के रूप में श्री राम का जन्म हुआ था जो आगे चलकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के नाम से जगत विख्यात हुए. आज के दिन मैं अपने बचपन की याद को ताजा करता हूँ जो कि अयोध्या के आस-पास के इलाके है वहां इस चैत्र के राम नवमी का पर्व बड़े हीं विधि-विधान और विविध पकवानों के साथ मनाया जाता था. आज मैं अपने गाँव से बहुत दूर एक शहर में नौकरी करते हुए जब उस दिन के बारे में सोचा तो बरबस हीं मन भर आया और अपने उन्हीं पुराने दिनों में खो गया. उन दिनों जब मैं छोटा था बचपन में नवमी के पूजा का एक महीने पहले से घर में तैयारी शुरू हो जाती थी. उन दिनों गाँव में मिट्टी के बने कच्चे मकान में बहुतायत थे, एक्का-दुक्का पक्के मकानों को छोड़कर। हम सब जगल से जा कर मटखन्ना (मिट्टी खोदने की जगह) से चिकनी मिट्टी खोदकर लाते थे और उसी मिट्टी से घर के अंदर और बाहर की दीवारों पर लिपाई करते थे फिर गोबर का लेप करके घर को साफ़-सुथरा किया जाता था और जो पूजा घर होता था उसमें पूजा के दिन 24 घंटे घर के ज्यादातर सदस्यों का प्रवेश वर्जित होता था. रात के समय पूजा होती थी और सुबह के नवमी की पूजा की समस्त तैयारी हो जाती थी क्योंकि ये पूजा मुहूर्त के हिसाब से या अधिकतर सूर्योदय से पहले कर दिया जाता था. पूजा में पूरी, रिकवच, हलवा, कटहल की सब्जी, उरद की दाल, चावल, गुजिया और नाना प्रकार के पकवान बनते थे. उस दिन हम जल्दी उठने की कोशिश करते थे और नीम की दातून अपने बिस्तर पर हीं रखते थे उठते हीं सबसे पहले दातून करते थे फिर खाने लग जाते थे. गुड़ की बनी हुई गुजिया मैं बड़े हीं चाव से खाता था जो की मेरी नानी बनाती थी पर अब वो स्वर्गवासी हो चुकी है आज के दिन मुझे मेरी नानी की बहुत याद आती है. अब देखता हूँ तो लगता है कि गाँव के रिवाज में भी बदलाव आ गया है वहां भी शहरों का दिखावापन लोगों के ब्यवहार में बड़े पैमाने पर शामिल हो गया है. राम नवमी का पर्व तो विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी आया पर मन को कुछ समय के लिए सोचनीय अवस्था में डाल गया. 

Wednesday, April 10, 2019

राफेल पर सरकार को सुप्रीम कोर्ट से सुप्रीम झटका


आज 2019 के पहले चरण के वोटिंग से ठीक एक दिन पहले सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राफेल पुनर्विचार याचिका के संबंध में बहुत बड़ा झटका लगा. जैसा की विदित है कि पूर्व में राफेल पर जांच के लिए अरुण शौरी, प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा जी जैसे नामी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी जिसमें सरकार से माननीय कोर्ट ने बंद लिफाफे में राफेल सौदे से संबंधित दस्तावेज अदालत में जमा करनाने का आदेश दिया था और पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार को साफ़-पाक बताया था और अपना फैसला सुनाया था. लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति जनता के सामने आयी तो उसमें प्रतीत हुआ कि सरकार ने कोर्ट से कुछ बात छुपाई है जिसकी बहुत बार चर्चा हो चुकी है. इसी दरम्यान "द हिन्दू" ने अपने स्वतंत्र स्रोतों के माध्यम से एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें मुख्यतः यह बात थी कि वर्तमान सौदे को लेकर रक्षा मंत्रालय के अधिकारी खुश नहीं थे क्योंकि रक्षा अधिकारियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय भी इसी सौदे को लेकर फ़्रांस की सरकार के साथ बात कर रही थी. जिसे लेकर रक्षा मंत्रालय के अधिकारी नाखुश थे और उस वक्त के रक्षामंत्री स्वर्गीय श्री मनोहर पारिकर को खत भी लिखा था. बहरहाल हम इससे आगे बढ़ते हैं इस रिपोर्ट को छपते हीं मानों देश की राजनीति में एक भूचाल आ गया फिर जिन लोगों की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था वो इन्हीं अखबार के खुलासों को आधार बनाकर उन्हीं न्यायाधीश के आगे अपनी पुर्नविचार याचिका दाखिल की और सरकार को सफाई पेश करने के लिए अदलात ने आदेश दिया और यहां सबसे कमाल की बात ये हुई कि अटार्नी जनरल के वेणुगोपाल जी ने मान कि ये दस्तावेज रक्षमंत्रालय के हीं है पर चोरी हुए हैं. ऐसा कह कर उन्होंने देश के सामने अपना और सरकार का बहुत मजाक बनवाया, फिर एक दिन बाद बोलते हैं कि ये दस्तावेज चोरी नहीं हुए बल्कि फोटोकॉपी हुए है जो अखबार ने गैरकानूनी तरिके से इसे हासिल किया है और इसके लिए अखबार के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए. यही दलील सुनकर अदालत ने 10 अप्रैल 2019 वक्त फैसले के लिए सुरक्षित रख दिया और आज जब 10 बजे ये फैसला आया तो सरकार के लिए सबसे बड़ा झटका यह था कि सुप्रीम कोर्ट राफेल याचिका पर फिर से सुनवाई के लिए तैयार हो गया. शायद सरकार को इस झटके की उम्मीद पहले से हीं थी जभी कभी चोरी होने का बहाना बनाया तो कभी फोटोकॉपी का. पर अब सरकार इस चुनावी मौसम में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर थोड़ा घिरती हुई नजर आ रही है क्योनी अब ये चोरी हुए दस्तावेज सुबूत का काम करेंगी। इस फैसले के तुरंत बाद से विपक्ष की सारी पार्टियां सरकार पर पूरी तरह से आक्रामक हो चुकी है. चुनावी मौसम में विपक्ष खासकर कांग्रेस के हाथ एक बड़ा और मजबूत मुद्दा लग चुका है जिसको भुनाने की कांग्रेस भरपूर कोशिश करेगी। इस फैसले का राहुल गांधी के ब्यक्तित्व पर भी बहुत बड़ा असर ये होगा कि जो लोग राहुल गाँधी की बात को मजाक में टाल देते थे अब आगे से उनको ऐसा करने से पहले सोचना होगा. मेरे अनुमान के मुताबिक बीजेपी/संघ को इसका कुछ न कुछ तो नुकसान जरूर उठाना पड़ेगा.

Tuesday, April 9, 2019

बीजेपी का संकल्प-पत्र 2014 की बातों का दोहराव

एक दिन पहले और लोक सभा के पहले चुनाव जिनमें ९१ सीटों पर चुनाव होने वाला है उसके तीन दिन पहले बड़ी मेहनत, मशक्क़त के बाद भजपा/संघ का भी घोषणा पत्र (संकल्प-पत्र ) जनता के सामने आ चुका है. भाजपा ने इस संकल्प-पत्र में कोई नई बात तो शामिल नहीं की अलबत्ता रोजगार को छोड़ लगभग पुराने मुख्य वादों को फिर से दोहरा दिया है. जिनका कुछ मुख्य अंश ये हैं -
  • कश्मीर से धारा ३७० हटाना 
  • कश्मीर से धारा ३५ अ हटाना 
  • अब राम मंदिर का निर्माण न्यायायिक प्रक्रिया के माध्यम से हल करना पहले किसी भी हाल में राम मंदिर का निर्माण करना 
  • २०२२ तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पहले यह वादा २०१९ तक के लिए था 
  • देश के राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा मसलन उग्रवाद और आतंकवाद पर कड़ाई से निपटना पहले २०१४ का भी ये मुख्य अंश रह चुका है 
  • हलाला पर प्रतिबंध लगाना 
  • ३३% महिलाओं को आरक्षण देना 
इनके अलावा और भी बहुत मुद्दे है फिर भी लगभग ७५ वादों का इनका संकल्प पत्र बन कर जनता के सामने आया है. जब इस संकल्प को पढ़ा गया तो कुछ बातों को देखकर ऐसा लगा कि क्या वाकई ये आडवाणी जी की पार्टी है जिसके लिए उन्होंने उत्तर से दक्षिण तक रथ यात्रा निकाली थी. मैं औरों का तो नहीं जानता पर मेरे लिए यह संकल्प-पत्र किसी झटके से कम नहीं था. उसका उदाहरण मैं आपको बीजेपी/संघ के सबसे बड़े और पुराने मुद्दे राम मंदिर निर्माण के संकल्प से शुरू करता हूँ और आप को याद दिलाना चाहता हूँ कि १९८९ के पालम पुर अधिवेशन में बीजेपी और संघ ने सामूहिक रूप से राम मंदिर निर्माण को लेकर एक आर-पार की जंग छेड़ने की योजना बनाई और अगले आम चुनाव में जब उतरी तो मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर का निर्माण इनके संकल्प पत्र में वचन क्रमांक १ पर था और इसी मानस के साथ जन-जागरण फैलाते हुए बीजेपी चुनाव में गयी और उसे इसका फायदा भी मिला उसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण घटना श्री आडवाणी जी की रत यात्रा भी रही है. इन्हीं राम के सहारे चलते-चलते शीघ्र हीं इन्होने दिल्ली की सत्ता हासिल कर ली. १९९८ में स्वर्गीय अटल जी पहली बार कुछ दिनों के लिए और दूसरी बार १९९९-२००४ तक सहयोगियों के साथ मिलकर ५ साल तक केंद्र की सत्ता पर विराजमान रहे. उसके बाद उनकी विदाई हो गयी. फिर १० साल के उपरान्त और तीन दशक के बाद किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला तो वो थी नरेंद्र मोदी निति बीजेपी की पार्टी को. जब पूर्ण बहुमत के बाद ये राम मंदिर नहीं बनवा सके, धारा ३७० और धारा ३५ अ, तीन तलाक बिल नहीं हटा सके तो आगे की क्या गारंटी है कि ये ऐसा कर सकते हैं जब बिलकुल साफ़-साफ़ दिख रहा है कि सत्ता के लिए सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी। इनकी सहयोगी पार्टी जीडीयू , लोक जनशक्ति पार्टी और पूर्वोत्तर की तमाम पार्टियां जो इस समय सत्ता में भागिदार हैं उनका बीजेपी/संघ के इन वादों के ठीक विपरीत विचार है और समय-समय पर इन्होने अपनी राय को बहुत हीं बेबाकी के साथ जनता के सामने रखा है तो ऐसी परिस्थिति में यह कैसे सम्भव है. इस पर सरकार को अवश्य रोशनी डालना चाहिए. हाँ इस २०१९ के घोसना पत्र में एक बात तो स्पष्ट है कि बीजेपी/संघ का एक मूल मुद्दा लगातार गिरावट की रहा है और वो है मंदिर निर्माण से संबंधित. मंदिर निर्माण पेज नंबर एक से शुरू होकर आज ३२ साल बाद पेज नंबर ४० पर मात्र दो लाइनों में सिमट कर रह गया है (जो ऊपर उल्लेखित है), परन्तु निरंतरता बनी हुई कि ३२ सालों से राम-भक्त राम मंदिर निर्माण शब्द से हीं बैकुंठ को पहुंच रहे है.

एक मुख्य बात ये है कि बीजेपी ने अबकी बार २०१४ की भांति रोजगार देने का एक निश्चित वादा नहीं किया है मतलब जो पिछली बार दो करोड़ रोजगार का वादा किया था कुछ वैसा अबकी बार नहीं. पूर्व की भांति कालाधन लाने का भी कोई जिक्र नहीं हैं शायद सरकार को लगने लग गया है कि सारा कालाधन विदेशों से अब देश में आ गया है.

खुश रहिये मस्त रहिये, जागरूक मतदाता बनिये किसी का तोता नहीं.  

Friday, April 5, 2019

कांग्रेस के घोषणा पत्र के संबंध में मेरी राय

जैसा की सर्वविदित है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व यानी लोकसभा चुनाव का आगाज चुनाव आयोग की तरफ से कर दिया गया है. देश की सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियाँ अपने पूरे दम-खम के साथ चुनावी समर में जा कूदी है. इस समर में सभी दल देश के भविष्य का खाका लेकर जनता के बीच जाती है और उनसे अपने हक में और दूसरे के विरोध में मताधिकार का प्रयोग करने के लिए कहती हैं, इस पद्धति को कोई मेनिफेस्टो कहता है, कोई घोषणा-पत्र कहता है, दृष्टि-पत्र तथा कोई वचन-पत्र भी नाम देता है. इसी पत्र को आधार मानकर जनता अपने मत का प्रयोग अपने अनुसार करती है. 2 अप्रैल को देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने अपना घोषणा-पत्र देश की जनता के सामने रखा उसमें रोजगार से लेकर किसान तक और राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक का जिक्र एक संतुलित आधार से किया है और मेरे अनुमान के मुताबिक़ यह एक संतुलित वचन-पत्र होता अगर इसमें कुछ अफवाह फैलाने वाली बातों का जिक्र नहीं किया गया होता जैसे -
  • कश्मीर में धारा 35 A और धारा 370 के संदर्भ में 
  • AFSPA हटाने या उसकी समीक्षा करने के संदर्भ में 
  • राजद्रोह के सड़े हुए कानून को खत्म करने के संदर्भ में
इन्हीं कुछ मुख्य बिंदुओं को आधार बनाकर संघ/भाजपा अपने पुराने और घृणित अगेन पर काम करने लग गयी हैं और अपने झूठे प्रचार के माध्यम से कांग्रेस को आतंक परस्त और और आतंकियों का हमदर्द बताने में जुट गयी है और इस झूठी मुहिम में चौकीदार सबसे आगे खड़े दिखाई दे रहे हैं. जैसा कि सभी जानते हैं कि कांग्रेस कश्मीर में धारा 35 A और धारा 370 के साथ आज 70 सालों से खड़ी रही है तो उसे यहाँ शामिल करने की कोई आवश्यता नहीं थी. रही बात AFSPA की तो जिस बात को लेकर संघ/भाजपा कांग्रेस पर हमलावर है और सुरक्षा से खिलवाड़ करने का आरोप लगा रही है वह 2015 से उत्तर-पूर्व के राज्यों त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणांचल, असम के कुछ जिलों से AFSPA को खुद हीं हटा लिया है तो इनका राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में तर्क देना बंदर के हाथ में उस्तरा देने जैसा लगता है. मैं मानता हूँ कि राजद्रोह की धारा 124 A की आज के समाज में कोई आवश्यकता नहीं है. क्योंकि इस धारा के माध्यम से राज्य सरकारें सवाल पूछने वाले को डरा रही हैं और राजद्रोह के नाम पर सवाल पूछने वाले लोगों को महीनों तक जेल में डाल रही है. वर्तमान परिदृश्य में राजद्रोह के शिकार हार्दिक पटेल, चंद्रशेखर रावण, गोंजाल्विस समेत तमाम युवा, पत्रकार और लेफ्ट समर्थित लेखकों को निशाना बनाया गया है. इसलिए एक बात को साफ़ कर देना चाहिए कि कांग्रेस के मेनिफेस्टों में राजद्रोह की धारा 124 A हटाने की बात की गयी है न कि राष्ट्रदोह की धारा 121 और अन्य.

मेरे विचार से कांग्रेस इन ध्रुवीकरण वाले मुद्दों को चुनाव के बाद अमल में ला सकती थी न कि घोषणा-पत्र में. 

संघ/भाजपा का घोषणा-पत्र आज के दिनांक शाम ४ बजे तक नहीं आया है इसलिए इसलिए उनकी चर्चा करना निरर्थक है.