राष्ट्रपति के अभिभाषण प्रस्ताव पर प्रधान मंत्री मोदी जी भाषण देते हुए शिमला समझौते का खामखा जिक्र कर बैठे और यह समझौता बेनजीर भुट्टो और श्रीमती इंदिरा गाँधी के साथ कराने की ऐतिहासिक भूल या कहें तो झूठ बोल बैठे। चलो शुक्र हैं कि हमारे विद्वान् प्रधानमंत्री ने शिमला समझौता इंदिरा और बेनजीर भुट्टो के बीच हीं कराया वरना उन्हें याद होता तो शिमला समझौता स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू और बेनजीर भुट्टो के बीच भी करा देते। लेकिन इस बात की तरफ भक्त मीडिया और भगवान शाह का ध्यान नहीं पहुंच पाया था. अगर ऐसे हीं जबान गलती से राहुल गाँधी की फिसल जाती तो देश में अब तक एक राष्ट्रीय समस्या खड़ी हो जाती। सारी गोदी मीडिया अब तक अनगिनत शो कर चुकी होती। बहरहाल वो तो मोदी है हीं झूठ बोलने के मास्टर। जब उनके झूठ से एना नहीं बच सके तो भुट्टो कहाँ से बचेंगी ?
बहरहाल प्रधानमंत्री के झूठ भरी बातों पर मिट्टी डालते हुए हम असली वाले शिमला समझौते की बात करते है उसके नफे, नुकसान, काल-चक्र की बात करते हैं. शिमला समझौते की शुरुआत 1971 में बांग्लादेश के उदय के बाद हुआ था. और यह समझौता पकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो और भारत की एक मात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा जी के साथ हुआ था. जब शिमला में ये समझौता हुआ उस समय बेनजीर भुट्टो धीरे-धीरे युवा हो रही थी और उनकी उम्र तकरीबन 20 बरस रही होगी (तो आज के भारत के प्रधानमंत्री ने यहां झूठ बोला था, है किसी मीडिया में दम जो मोदी जी को झूठा बोले). शिमला समझौते की नीव 1971 में पड़ चुकी थी जब भारत ने पश्चिमी पाकिस्तान को मुक्त कराते हुए विश्व को बांग्लादेश नामक एक नए देश के रूप में परिचित करवाया. बांग्लादेश का गठन किया जाना इंसान के किये हुए फैसलों में एक अतुलिनीय फैसला है, जिसे अपने दृढ निश्चय से इंदिरा गाँधी ने उठाया था और उसमें सफलता भी पायी थी. इसी युद्ध के दौरान भारत ने पकिस्तान के लगभग 93 हजार सैनिको को युद्ध बंदी बना लिया था या ये कहें पाकिस्तानी सैनिको ने भारत के पूर्वी कमान के आगे घुटने तक दिए थे, सरेंडर कर दिए थे. उधर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में जुल्फिकार अली भुट्टो को मुंह दिखाना भारी पड़ रहा था. उनकी हर तरफ आलोचना होने लगी थी जिसकी वजह से उन्हने सत्ता जानें का डर सताने लगा था. इधर जो पाकिस्तानी सैनिक भारतीय जेलों में बंद थे उनके हवाले से आल इण्डिया पर " हम खैरियत से हैं " नाम से एक प्रोग्राम चलाया जाता था जिसे पूरे पकिस्तान के लोग सुनते थे और उनके परिवार जनों को भी ये अहसास होता था कि उनके बच्चे पड़ोसी देश में सही से रहा रहे है और वो ये भी सोचते थे कि अगर पकिस्तान में होते जब भी साल में एक बार हीं देखने को मिलता था.
इधर जुल्फिकार अली अपने आप को शर्मिंदगी से बचाने के लिए भारत की तरफ देखना शुरू किया और नई दिल्ली को खबर भिजवाई कि वो मिलना चाहते हैं. प्रक्रिया आगे बढ़ी और इसके लिए 2 जुलाई की एक तिथि निर्धारित की गई. 2-3 जुलाई 1972 की आधी रात को यह समझौता हुआ। भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच 2 जुलाई की रात 10.30 बजे के करीब बातचीत शुरू हुई और देर रात 12 बजकर 40 मिनट तक चलती रही. इसी समय भारत-पाकिस्तान के बीच एक समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए. जिसे "शिमला समझौता नाम दिया गया."
इस समझौते के मुख्य बिंदु कुछ इस प्रकार हैं -
1. दोनों देशों के बीच भविष्य में जब भी बातचीत होगी कोई मध्यस्थ या तीसरा पक्ष नहीं होगा.
2. 1971 के युद्ध में भारत द्वारा कब्जा की गई पाकिस्तान की जमीन भी वापस कर दिया जाएगा.
3. शिमला समझौता के बाद भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियो को रिहा कर दिया.
4. आवागमन की सुविधाएं स्थापित की जाएंगी ताकि दोनों देशों के लोग आसानी से आ जा सकें.
5. दोनों ही देश इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेंगे.
6. दोनों देशों ने तय किया कि 17 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस स्थिति में थी उस रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाएगा.
ये अलग बात है कि जुल्फिकार भुट्टो इस समझौते के 15 दिन बाद पाकिस्तानी संसद में कश्मीर में पाकिस्तान के समर्थन की घोषणा करके इस समझौते की अवहेलना की. दरअसल पाकिस्तान बांग्लादेश के मुद्दे पर मिली हार से खीझ चुका था जो आज तक कायम है. इसीलिए वो आज भी कश्मीर का राग अलापता रहता है.
इसलिए मोदी जी को गौर करना चाहिए कि जो नेहरू, इंदिरा को हर वक्त पानी पी-पी के कोसते रहते है वो आप गलत करते हैं. नेहरू और इंदिरा ने देश और दुनिया को बहुत कुछ दिया है. जैसे आपकी मातृ संगठन आरएसएस ने अंग्रेजी हुकूमत को दिया था. वैसे नेहरू परिवार ने इस देश को दिया है. नेहरू परिवार ने बलिदान भी पीढ़ियों और वंश में दिया है. पंडित मोतीलाल नेहरू आजादी के आंदोलनों में गाँधी जी के आने से पहले हमेशा आगे रहे, नेहरू ने एक दशक से ज्यादा जेल की सजा काटा, पूज्य माता कमला नेहरू जी का देहांत यातनाओं को सहते हुए हो गयी और उनको मुखाग्नि देने के लिए भी ब्रिटिश हुकूमत ने नेहरू जी को दो दिन की छुट्टी नहीं दी. आजादी के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी जी को छलनी कर दिया जाता है, 1991 में श्री राजीव गांधी के शरीर को बम से उड़ा दिया जाता है. तो क्या ये वंशवाद नहीं था ? क्या बलिदान में आपको वंशवाद नहीं दिखता ? केवल राजनीति में वंशवाद दिखता है. छोटी सोच को उतार कर फेक दो और हृदय से पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्य की सराहना करो वरना कल आप भी गाली पाओगे। ये एक गलत परम्परा हमारे समाज में अपना जगह बना लेगी.
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