Thursday, January 3, 2019

सावित्री बाई फूले का जीवन संघर्ष

सावित्री बाई को इस समाज में दलित महिला हीं नहीं बल्कि सम्पूर्ण महिलाओं के लिए शिक्षा और अपने हक की लड़ाई लड़ने का अग्रदूत माना जाना चाहिये, सावित्री बाई का जीवन पुणे शहर में बड़ी हीं कठिनाइयों के साथ बीता था उन्होंने लड़कियों को पढ़ने के लिए एक स्कूल खोला था. जब वो घर से स्कूल के लिए निकलती थी तो दो साड़ी लेकर निकलती थी जो एक तन पर होती थी और दूसरी थैले में क्योंकि स्कूल जाते समय रूढ़िवादी ब्राह्मण उनके ऊपर गोबर फेकते थे जिसकी वजह से वो बदबू से भर जाती थी. ऐसा इसलिए होता था कि ब्राह्मणों का ये मानना था कि शुद्रो और अति शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं है. इतना सब कुछ सहते हुए जब सावित्री बाई फूले जाती थी तो दूसरी साड़ी पहन कर लड़कियों को पढ़ाती थी यह स्कूल पुणे शहर के भीलवाड़ी में था, इस तरह उनका जीवन किसी ग्रन्थ से कम नहीं था इस पुरूष समाज में वो देवी की अवतार थी.
  
सावित्री बाई इस पुरूष प्रधान समाज की एकलौती और अलौकिक नारी है जो स्त्रियों के सम्मान की वास्तविक लड़ाई लड़ी है. सावित्री बाई ने पहला स्कूल नहीं खोला, पहली अध्यापिका नहीं बनीं, बल्कि भारत में औरतें अब वैसी नहीं दिखेंगी जैसी दिखती आई हैं, इसका पहला जीता जागता मौलिक चार्टर बन गईं. उन्होंने भारत की मरी हुई और मार दी गई औरतों को दोबारा से जन्म दिया. मर्दों का चोर समाज पुणे की विधवाओं को गर्भवती कर आत्महत्या के लिए छोड़ जाता था. सावित्री बाई ने ऐसी गर्भवती विधवाओं के लिए जो किया है उसकी मिसाल दुनिया में शायद ही हो. '1892 में उन्होंने महिला सेवा मंडल के रूप में पुणे की विधवा स्त्रियों के आर्थिक विकास के लिए देश का पहला महिला संगठन बनाया. इस संगठन में हर 15 दिनों में सावित्रीबाई स्वयं सभी गरीब दलित और विधवा स्त्रियों से चर्चा करतीं, उनका हाल-चाल लेती उनकी समस्या सुनती और उसे दूर करने का उपाय भी सुझाती और उसकी जिम्मेदारी भी खुद अपने ऊपर ले लेती .' मैंने यह हिस्सा फार्वर्ड प्रेस में सुजाता पारमिता के लेख से लिया है. सुजाता ने सावित्रीबाई फुले का जीवन-वृत विस्तार से लिखा है. आप उसे पढ़िए और शिक्षक हैं तो क्लास रूम में पढ़ कर सुनाइये. ये हिस्सा ज़ोर-ज़ोर से पढ़िए.

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