बिपिन नंदलाल गिरि
आज-कल किसान शब्द का बहुत बोल-बाला है आप लोग दो-चार दिन में किसी न किसी नेता से किसान शब्द सुन हीं लेते होंगे जी हाँ मैं उसी किसान, धरती-पुत्र की बात कर रहा हूँ जो आज-कल सबकी जबान पर चढ़ा हुआ है पर दिल में किसने बसाया है ये न तो किसान को पता है न हीं उन्हें स्वयं को (उन्हें से मतलब किसान-किसान चिल्लाने वाले नेताओं से है). किसान तो इस धरती का वह असहाय जीव बन गया है जिसे हाथ-पैर, दिल में धड़कन और सोचने के लिए दिमाग तो हैं पर अब वो उसके किसी काम के लिए नहीं रहा. किसान की ऐसी दुर्दशा हो चली है कि उम्र के अंतिम पड़ाव में उसकी सगी अपनी औलाद भी साथ छोड़ देती है और छोड़ती क्यों है उसका भी कुछ वाजिब और कुछ गैर-वाजिब कारण है वाजिब कारण ये है कि उस किसान के पास इतना धन (पैसा) नहीं होता कि उसके बच्चे उसकी सेहत का सही ढंग से ख्याल रख सकें और अगर उस किसान का बेटा किसी शहर में रोजी-रोजगार के लिए चला गया हो तो उसे भी वहां मेहनत के बराबर मजदूरी नहीं मिलती है और रही सही कसर सरकारों की गलत नितियाँ जैसे नोटबंदी, जीएसटी, शहरी करण को बढ़ावा ये उसे और तोड़ देती है. किसानों के नाम पर समय-समय पर कुछ न कुछ घोषणाएं करके ठगा गया है वो चाहे MSP हो या मंडी, समिति, फसलों का उचित मूल्य दिलाने का वादा. इनमें से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तो भ्र्ष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण है CSDS के आकड़ों के अनुसार बीमा कंपनियों ने लगभग 32% से ज्यादा शुद्ध लाभ इस योजना से कमाया है.
2014-2015 के साल में सूखा बहुत पड़ा था पर केंद्र सरकार ने उससे निपटने का सही तरीका नहीं सुझाया था उलटे जब वो चुनाव प्रचार में गए थे तो किसान के हित में बहुत बड़े-बड़े वादे किये थे. अभी दो दिन पहले एक किसान प्रदीप शर्मा गाँव बरौली अहीर आगरा के रहने वाले हैं उनकी एक ऐसी रिपोर्ट आयी है कि ब्यवस्था को शर्म आ जाये अगर शर्म न आये तो ये मान लेना चाहिए कि शासन की आँखों का पानी मर चूका है दरअसल बात ऐसी है कि किसान ने धुप, वर्षा, ठंडी सह करके आलू की खेती पूरे लगन से की और 19 टन का बम्पर पैदावार अपना खून-पसीना एक कर के किया यहां तक उस किसान का फर्ज था उसने उसे पूरा किया पर इसके बाद अब शासन का अहम किरदार आता है उसने आलू की ढुलाई करवाई, कोल्ड स्टोरेज में रखा और जब उसे बाजार में बेचने के बाद वो अपने सारे खर्चों को जोड़ता है तो उसे मात्र 490 रूपये का मुनाफा होता है. अब आप पाठक हीं बताएं कि क्या उसके इतने महीनों के मेहनत की कमाई बचत मात्र 490 रूपये की होनी चाहिए मेरे ख्याल से नहीं, अब ऐसे में किसान अपनी जान नहीं देगा तो और क्या करेगा.
किसानों को घोषणाओं के नाम पर ठगना-
किसानों को घोषणाओं के नाम पर ठगना-
- मंडियों में किसानों के जींस को खरीदने का वादा तो किया जाता है पर खरीदने में काफी हिला-हवाली की जाती है. मंडियों में किसानों के अनाज तीन-चार दिन बाद जब नहीं बिकता था तो किसान औने-पौने दाम में घाटे के साथ अपनी फसल को बेच कर आ जाता है. जिसकी वजह से उसे बहुत नुकसान होता था.
- एक घोषणा मृदा (मिट्टी) की जांच के लिए हुई थी पर कितने किसानों तक पहुंची वो कोई नहीं बता सकता है.
- किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ सिर्फ बड़े और रसूखदार किसानों को हीं मिलता है.
- फसल बीमा के नाम पर झुनझुना पकड़ा देना पर फसल नष्ट होने के बाद मुआवजा न मिलना.
किसान अपनी खेती के लिए हर वो जतन करता है जो वह अपनी प्यारी संन्तान के लिए करता है क्योंकि किसान जानता है कि खेती और संतान दोनों उसका भविष्य है खेती से कल सबका पेट भरेगा और संतान से कल सुख मिलेगा परन्तु हकीकत में ये दोनों अब किसान से दूर होते जा रहे है रही बात खेती की तो वो भगवान के सहारे ज्यादा रह गयी है नेताओं के सहारे कम. किसान को न तो समय पर खाद-बीज सरकारें उपलब्ध करवा पा रहीं है न तो खेतों को सिंचाई के लिए पानी, जहां नहर की ब्यवस्था है वहां भी सिंचाई के लिए पानी का जबरदस्त किल्लत है कई बार तो फसल सूख जाने के बाद नहर में पानी आता है जब फसल ही सूख कर नष्ट हो गयी तो अब पानी का किसान क्या करेगा।
मैं खुद एक किसान हूँ और इन लिखी हुई बातों में मेरे अपने अहसास भी हैं जो करोङों लोगों के है आज भी देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती पर आश्रित है पर खेती में लाभ के लिए कोई तय कार्यक्रम नहीं है वहीं उल्टे दूसरी तरफ 1 प्रतिशत पूँजी-पतियों के लिए कुबेर का खजाना चौबीसों घंटा खुला हुआ है और ब्यवस्था इस इन्तजार में बैठी रहती है कि कब कोई अडानी, अम्बानी, मेहुल, माल्या आएं और दान लेकर जाये वही दूसरी तरफ किसानों के कुछ हजार रूपये माफ़ हो जाये तो देश की अर्थ-ब्यवस्था की दुहाई का उपदेश देने वाले हजारों लोग आ जाते है किसान की बैठा आज हिमालय सी हो गयी है और वो अब असहनीय पीड़ा में जीने को मजबूर है .........
धरती-पुत्र की एक पुकार
कर्जमुक्त करो सरकार
खेत में खलिहान में
धुप औ बरसात में
जो अडिग स्थिर रहे
भयभीत ना हो ताप से
जो डरता नहीं है काल से
जीता है नित अभिमान से
करता रहें नित्य कर्म जो
वसुधा का है लाल वो
है हिन्द का अभिमान वो
रहता जो मकरंद हो
बहता नदी सा रक्त हो
विचलित तनिक ना शांत हो
निज आप परअभिमान हो
ऐसा धरा का लाल हो
वो हिन्द की औलाद हो
किसान की औलाद हो
"बिपिन गिरि"
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