बिपिन नंदलाल गिरि
आज से मकर संक्रांति के शुभ अवसर में जैसे हीं तेज के देवता सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया वैसे हीं ब्रम्ह मुहूर्त (भोर) में माँ गंगा में भक्तों के स्नान-ध्यान का सिलसिला शुरू हो गया जो अब तक अनवरत 4 मार्च (महा शिवरात्रि) तक चलता रहेगा और बीच-बीच में कई अत्यंत महत्वपूर्ण स्नान आएंगे जिनका अति-विशिस्ट महत्व होगा, माँ गंगा के बारे में हम हिन्दुओं की ये धारणा है कि माँ गंगा स्वर्ग लोक से उतरी हैं और धरती पर भगवान आशुतोष (शिव) की जटाओं (बाल का जुड़ा) से होते हुए आयी हैं और माँ गंगा पतित पावनी है कोई कितना भी पापी क्यों न हों वो अगर माँ के चरणों में अपने आपको समर्पित करके मैया में डूबकी लगा लेता है तो पतित गंगा बिना देर लगाएं उसे माफ़ कर देती हैं और अपनी शरण में ले लेती है, हमारे वेद और पुराणों में माँ गंगा का बहुत उच्च स्थान है माँ गंगा के जल को वेदों में अमृत समान पवित्र माना गया है, गंगाजल पीने मात्र से हीं असंख्य रोगों का निवारण स्वतः हो जाता है. मै भी माँ गंगा में अटूट आस्था रखता हूँ और मुझे भी दो बार संगम पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है एक बार तो त्रिलोचन महादेव के मंदिर पर संत आये थे जिनका नाम परम पूज्य श्री करुणानन्द सरस्वती था उन महाराज ने चौमास (सावन 2010) पूजा के दौरान संगम से पवित्र जल लाने का आदेश दिया था जिसका पालन करते हुए नन्हे अग्रहरि के अगुवाई में मैं उदयी चाचा, श्याम चाचा (बल्ली) और भी दो या तीन लोग जल लाने के लिए संगम गये थे और वहां से अमृत समान पवित्र जल लेकर आये थे.तीर्थों के राजा प्रयागराज में आप समस्त भक्तों का स्वागत है पतित पावनी माँ गंगा में पवित्र कुम्भ स्नान की शुरुआत हो चुकी है. अतः आप सब भक्त माँ गंगा में डूबकी लगाए, हमारा वेद कहता है कि जगत पावनी माँ गंगा में डूबकी लगाने मात्र से ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त हो जाता है.
बात
आती है कुम्भ स्नान की तो ये भब्य परम्परा बहुत सदियों से यूं हीं अनवरत चली आ रही
है. इतिहास में कुंभ के मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है,
जिसको चीन के प्रसद्धि बौद्ध भिक्षु ह्रेनसान ने ईसा की सातवीं शताब्दी में आंखों देखी
वर्णन का उल्लेख किया है। कुम्भ का संस्कृत शब्द कलश होता है और कहीं-कहीं सुनने को
मिलता है कि कुम्भ की शुरुआत समुद्र मंथन के दौरान निकले हुए अमृत-कलश से हुयी थी.
जब अमृत-कलश समुद्र से बाहर है तो देव और दानवों की लड़ाई में अमृत की कुछ बूँदें छलक कर चार जगहों पर गिरी थी:- गंगा नदी (प्रयाग, हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक),
क्षिप्रा नदी (उज्जैन)। सभी नदियों का संबंध गंगा से है। गोदावरी को गोमती गंगा के
नाम से पुकारते हैं। क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं, यहां पर
गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है.
ब्रह्म
पुराण एवं स्कंध पुराण के 2 श्लोकों के माध्यम इसे समझा जा सकता है.
विन्ध्यस्य दक्षिणे गंगा गौतमी सा निगद्यते
उत्त्रे सापि विन्ध्यस्य भगीरत्यभिधीयते
एव मुक्त्वाद गता गंगा कलया वन संस्थिता
गंगेश्वेरं तु यः पश्येत स्नात्वा शिप्राम्भासि
प्रिये
शरीर
की शुद्धि के लिए स्नान का कितना महत्व है यह हमारे शास्त्रों में वर्णित है. 4 प्रकार
के स्नान होते हैं - भस्म स्नान, जल स्नान, मंत्र स्नान एवं गोरज स्नान.
आग्नेयं
भस्मना स्नानं सलिलेत तु वारुणम्।
आपोहिष्टैति
ब्राह्मम् व्याव्यम् गोरजं स्मृतम्।।
भस्म
स्नान को अग्नि स्नान, जल से स्नान करने को वरुण स्नान, आपोहिष्टादि मंत्रों द्वारा
किए गए स्नान को ब्रह्म स्नान तथा गोधूलि द्वारा किए गए स्नान को वायव्य स्नान कहा
जाता है.
मान्यताओं
के अनुसार 7 हजार धनुष हर वक्त माँ गंगा की रक्षा में लगे रहते हैं और देवताओं के राजा
इन्द्र समूचे प्रयाग की रक्षा करते है. विष्णु जी आतंरिक प्रयाग मण्डल की रक्षा करते
रहते हैं एंव अक्षयवट (जो की इसी कुम्भ मेले में श्रद्धालुओं को कई दशकों बाद खोला
गया है) की रक्षा स्वयं उमापति करते है। प्रयागराज में एक माह तक सत्य, अहिंसा और ब्रहमचर्य
के पालन का विश्व का सबसे बड़ा उदाहरण होता
है जिससे इन कियाओं के दम पर मानव जाति को असीम उर्जा की प्राप्ति होती है. पृथ्वी
की एक लाख बार प्रवीक्षण करने का फल कुंभ पर स्नान, दान आदि कर्म करने से प्राप्त होता
है. इस कुम्भ में करोङो लोग आते है और स्नान, ध्यान, दान का लाभ उठाते है और हमारे
धर्म का या कुदरत का करिश्मा कह सकते हैं कि करोड़ों-करोड़ लोग बिना किसी आमंत्रण की
आते है और यहां सब माँ गंगा की भक्ति में भेद-भाव भूलकर लीन रहते हैं और अपने ईष्ट
नाम का जाप करते रहते हैं.
हर हर गंगे !!
हर हर गंगे !!
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