Tuesday, December 4, 2018

हिंदी दिवस



"हिंदी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा"


हिंदी दिवस के पावन दिन पर हिंदी के समस्त प्रेमियों को मेरी तरफ से हार्दिक बधाईऔर शुभकामनाएं।आज हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर मै अपने विचारों को आपहिंदी प्रेमियों के सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ क्योंकि हिंदी है तो हम है.हिंदीविश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली दूसरी भाषा है हमें गर्व है कि हम हिंदी भाषी क्षेत्र मेंजन्म लिए आज के ही दिन 69 साल पहले देश के प्रथम प्रधानमंत्री श्रीजवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में हिंदी को "राज्य भाषाका दर्जा प्राप्त हुआ थाइसलिए 14 सितम्बर को हम हिंदी दिवस के रूप में याद करते हैं,ऐसा नहीं है किइससे पहले हिंदी नहीं थी,हिंदी थी परन्तु रियासतों की तरह हिंदी भी बटी और उनरियासतों में अपनी क्षेत्रीय भाषाओँ को अपने दैनिक कार्य में तवज्जो देते थे.

दोस्तों हमारी मातृ भाषा तो वैदिक भाषा"संस्कृत" थी परन्तु उसका अपभ्रंश हुआ औरहम यहां तक  गए और हिंदी देव भाषा संस्कृत का ही एक रूप है हमारे आजाददेश में हिंदी को को अपनी पहचान बनाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था क्योंकिजब मुग़ल आये तो उन्होंने "उर्दूका प्रचार-प्रसार और बहुतायत में प्रयोग किया औरउसे स्थापित करने की कोशिश की,उनके जाने के बाद अंग्रेज आये तो उन्होंने"अंग्रेजीको बढ़ावा दिया जिसे लेकर हम आज भी ढो रहे है,हर आम बोल-चाल कीभाषा में हम अंग्रेजी का प्रयोग करते है तो ऐसी आदतों से हमें दूर होकर अपनी राष्ट्र-भाषा को अपनाना चाहिए। एक दिन हिंदी दिवस मना लेने से हिंदी की भलाई नहींहोगी इसके लिए हमे अपने जीवन में और अपने चाहने वालों के जीवन में हिंदी कोबसा लेना चाहिए जब हमारी राष्ट्र-भाषा का हकीकत में सम्मान होगा।

आजादी के बाद भी हमारे देश में भी हिंदी को कई बार उपेक्षित होना पड़ाजिसका एक उदहारण आजादी के बाद ही अविभाजित "तमिलनाडूसे शुरूहुई और उस आंदोलन का नेतृत्व "द्रमुकनाम की एक राजनितिक विचार सेहुआ और उसी आंदोलन से निकला हुआ एक ब्यक्ति हिंदुस्तान की राजनीति काएक बहुत बड़ा चेहरा बना जिनका नाम "करूणानिधिथा जो कुछ महीनोंपहले ही स्वर्गवासी हुए है.करूणानिधि जी के द्वारा चलाया गया आंदोलन पूरीतरह से हिंदी के खिलाफ और क्षेत्रीय भाषाओँ के समर्थन में था इस घटना का उनके राजनितिक जीवन पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा और 60 के दशक के अंत मेंवो सरकार में भी आये.      

तो इस तरह से हमारी प्यारी हिंदी को बहुत से कठिनाइयों से गुजरना पड़ा और इन्हीकठिनाइयों के बीच में हिंदी ने आज हमारे समाज में एक उत्कृष्ट स्थान हासिल किया।हिंदी के लिए हमारे कवि,लेखक और बुद्धजीवियों ने बहुत लम्बी लड़ाई लड़ी औरविपरीत परिस्थितियों में भी हिंदी का साथ नहीं छोड़ा उनमे से कुछ महानुभाओं केनाम का मैं उल्लेख कर रहा हूँ,बाबा नागार्जुन,श्री रामधारी सिंह "दिनकर",सुमित्रानंदन पंत,महादेवी वर्मा,हरिवंश राय "बच्चन",मुंशी प्रेमचंद,जय शंकर प्रसाद औरइनके जैसे अन्यान्य लोग थे,जिन्होंने  हिंदी भाषा की पूजा की उससे मै बहुत प्रभावित हूँऔर मैं इन्हें प्रणाम करता हूँ.

 डॉराजेन्द्र प्रसाद जी के अनुसार "जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य केगौरव का अनुभव नहीं हैवह उन्नत नहीं हो सकता।"




 नमः शिवाय
जय त्रिलोचन महादेव 

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