बात शुरू करना चाहूंगा की आप लोगों के कान में "इमरजेंसी" नाम का शब्द कई बार आया होगा और मसलन हर चुनाव के वक्त-बेवक्त आता-जाता रहताहै,तो आपातकाल की जो काली कहानी है उससे हम जो अपने आप को युवा बोलते हैउससे अनभिज्ञ होंगें क्योंकि वो हमारे जन्म से पहले की बात थी परन्तु उसकी चर्चाआज भी होती है.उस वक्त देश की प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गाँधी जी थी जिन्होंने आधीरात को जब सब नींद में थे तब उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री "फखरुद्दीनअली"के आदेश से 1975 में आपातकाल की घोषणा कर दी और इस एक मात्र आदेशसे सविधान द्वारा नागरिकों का दिए हुए सारे अधिकार छीन लिए. जिससे इंदिरा गाँधीजी की बहुत फजीहत हुई और उसका परिणाम ये हुआ की वो अपनी संसदीय क्षेत्र मेंअपना चुनाव हार गयी.क्योंकि उनके सामने जो एक चेहरा था वो भी कांग्रेस से हींनिकला जय प्रकाश जी "बिहार से" थे और उनके पीछे संघ अपनी पूरी ताकत के साथखड़ा था.
हम कह सकते है कि जय प्रकाश जी संघ के हाथों में खेल रहे थे जिससे वो खुद भीअनजान थे परन्तु जब 1977 में चुनाव हुआ तो कांग्रेस पार्टी बहुत बुरी तरह से चुनावहार गयी और श्री मोरार जी देसाई के नेतृत्व में देश को एक गैर कांग्रेसी सरकार "केंद्रके स्तर पर"मिली,परन्तु यह सरकार गठन के बाद से हीं अपने अंतर्द्वंद्वों से लड़ती रहीऔर 1980 में इस सरकार के सारे साथी अपनी ढपली-अपना राग गाते हुए अलग होगए फिर चुनाव हुआ और कांग्रेस बड़े अंतर से चुनाव जितने में सफल रही औरसरकार बनाई,लेकिन आपातकाल के खंड में संघ की दो तरह की भूमिका रही जिसमेंएक तो यह थी की इंदिरा गाँधी के साथ रहने का दिखावा और जे पी जी का साथ दियाजाये उसमें संघ के बहुत प्रभावशाली देवरस जी परदे के पीछे से जे पी जी के आंदोलनको खूब हवा दी.
1977 में जब मोरार जी देश के प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने ने भी 5000 रुपए के बड़ेमूल्य का नोट बंद किया था,कालेधन और न जाने किस-किस धन के खात्में का भाषणदिया करते थे,परन्तु 8 महीने बाद हीं जब हकीकत सामने आयी तो उनका नोटबंदीका फैसला असफल सा दिखने लगा जैसे आज के प्रधानमंत्री 8 नवंबर 2016 कोनोटबंदी की घोषणा करते समय बहुत बड़े-बड़े वादे और दावे कर रहे थे परन्तु दोसाल बाद जब आर बी आई की रिपोर्ट आयी तो पता चला का 99.30% रूपये वापसबैंक में आ चुके थे,परन्तु अब भी सरकार को पता नहीं कैसे लगता है कि उनकाफैसला सफल रहा परन्तु अब प्रधानमंत्री जी नोटबंदी का नाम अपनी जबान पर भूलकर भी नहीं लाते यही असफलता का प्रमाण है.
बीते दौर के साथ-साथ राजनीति में पैसों का बोलबाला बढ़ता गया और उसमे कोई यहनहीं तय कर सका की कालाधन कितना है और ईमानदारी का धन कितनाहै,ADR नाम की एक स्वायत्त संस्था है जो चुनाव के हर पहलू की रिपोर्ट और विश्लेषणकरती है वो बताती है 1952-2009 तक जितना पैसा चंदे के रूप में आया था उतनापैसा 2015-2018 देश की एक हीं सत्ताधारी पार्टी के हिस्से में आया तो आप खुद सेअंदाजा लगा सकते है कि ये पैसा किसका होगा ये पैसा या तो किसी ब्यवसायी काहोगा या किसी राजनीतिज्ञ की काली कमाई का हिस्सा होगा और ऐसे लोग हीं कालेधन को ख़त्म करने का दवा देते है जो कथनी में तो प्रतीत होता है परन्तु उनके चरित्रमें कही सारगर्भित नहीं होता,अगर हिम्मत है तो बताएं कि इतने पैसे जो आये उनकास्रोत क्या है.
तो गौर करने वाली ये बात है कि संघ हमेशा से एक पक्षीय और दोहरी दिखावा करताहै और संघ के अंदर अपने विचार को छोड़ देने का भी चलन रहा है जैसे हाल ही मेंभगवत जी ने आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार की लिखी हुई किताब "बैंच ऑफ़थॉट्स"को भी नकार दिया जो 2017 तक इस किताब में कही हुई बातों का अक्षरशःपालन करती थी.
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