Friday, July 24, 2020

राजस्थान में सत्ता की लड़ाई राजभवन पहुंची

पिछले लगभग दो हफ्ते से शुरू हुआ राजस्थान की सियासत का झगड़ा आज राज्यपाल महोदय के आंगन में पहुंच हीं गया। सचिन पायलट और अशोक गहलोत जी के बीच राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई इस हद तक पहुंच जायेगी कि पार्टी में हीं बगावत हो जायेगी‌। इस बात का अंदाजा शायद कांग्रेस आलाकमान को भी नहीं रही होगी। लेकिन आज राजस्थान के राजनिति में जो कुछ भी घटित हो रहा है। उससे सबसे ज्यादा निराश राजस्थान की बेचारी जनता होगी। विधायक जयपुर से लेकर दिल्ली तक होटलों में कैद हैं और उनके क्षेत्र की मासूम जनता अनेक परेशानियों से रोज दो-चार हो रही है। उसका किसी को शायद अंदाजा नहीं है।
जब भी सरकार कोई गिरती या गिराना होता है तो उसमें भाजपा का हीं नाम आता है। और सारा दोष भाजपा के सिर पर मढ़ने की कोशिश कांग्रेस की तरफ से की जाती है। जिसे मैं तर्क संगत नहीं मानता। क्योंकि कांग्रेस ने संगठन के नेताओं को तवज्जो न देते हुए विरासत वालों को तवज्जो देती रही है। विरासत होने की वजह से कुछ वफादार लोग उनके भी चुनकर आते हैं। जो अपनी वफादारी साबित करने के लिए किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार रहते हैं। जिसका परिणाम पहले मध्य प्रदेश और अब राजस्थान में देखने को मिल रहा है। विरासत वाली राजनीति को लेकर जो गलती कांग्रेस ने की वहीं अब बीजेपी कर रही है। जब वो कांग्रेस के विधायकों को इस्तीफे के बाद अपनाती है तो उसके साथ एक शर्त भी जुड़ी होती है कि फलां क्षेत्र का टिकट शामिल (बागी) होने वाले को हीं दिया जायेगा। जिसके फलस्वरूप बीजेपी का जमीनी कार्यकर्ता निराश होने लगता है और अपने घर में बैठ जाता है। अब तक बीजेपी को संगठन और कार्यकर्ताओं की पार्टी कहा जाता रहा है पर कुछ सालों में बीजेपी के चरित्र में घोर परिवर्तन आया है। जो कल कांग्रेस की तरह बीजेपी के लिए भी दुखदाई साबित होगा।
माना कि राजस्थान में जादूई आंकड़ा कांग्रेस और गहलोत के पक्ष में है। फिर भी उन्हें और कांग्रेस आलाकमान को कुछ चीजें नजदीक से देखना चाहिए था। कांग्रेस आलाकमान शायद मध्य प्रदेश के तख्तापलट से कुछ सिखा नहीं। खैर पिछे जो हुआ उसे भूलाकर कांग्रेस कम से कम अब से सबक सिखाते हुए अपने नेताओं पर पैनी नजर रखे तो भविष्य को संवारा जा सकता है और फिर से अपने पुराने रौं में कांग्रेस पार्टी लौट सकती है। राजस्थान की सरकार फिलहाल तो सुरक्षित दिख रही है पर अब तक ? भाजपा जब तक चाहे तब तक। भाजपा के अन्दर सत्ता की बहुत भूख हो गयी है और कहीं न कहीं संविधान संशोधन और हिन्दू राष्ट्र की तरफ बढ़ने का छिपा एजेंडा भाजपा इस रणनीति में दिखाई पड़ती है।

Tuesday, July 14, 2020

भाजपा के सह पर पायलट कहीं के नहीं रहे

राजस्थान में कांग्रेस नीत सरकार में पिछले तीन दिनों से बहुत उथल-पुथल मची हुई है। इस उथल-पुथल के पिछे युवा नेता और उप-मुख्यमंत्री श्री सचिन पायलट जी की बढ़ती हुई महत्त्वाकांक्षाएं है। मध्य प्रदेश की तरह पिछे से भाजपा ने उनको हवा दिया और अपने समर्थक विधायकों की गिनती किए बिना बगावत कर दिल्ली में डेरा डाल रखा है। और उधर पुराने, मंझे हुए तीन बार के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी थे। जिन्हें पायलट ग्रुप के विद्रोह की भनक बहुत पहले हीं पता चल गई थी। उसी के मद्देनजर गहलोत जी ने भी अपना चौरस बिछाना शुरू कर दिया था। जिसमें सचिन पायलट और उनके समर्थक फंसते चले गए और परिणाम आज सबके सामने है।
बीजेपी ने पायलट को अन्दर खाने हवा देने का काम काफी समय पहले से शुरू कर दिया था। और अभी तक सफलता पूर्वक आगे भी बढ़ रहें हैं। सचिन पायलट और गहलोत के बीच संघर्ष की पटकथा दिसंबर 2018 में हीं लिखी जा चुकी थी। जब पायलट पर तरजीह देकर गहलोत को राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया गया था।

Friday, July 10, 2020

विकास दूबे पुलिसिया शैली के इनकाउंटर में मारा गया और नेता बच गए

जैसी की पहले से उम्मीद थी कि विकास दूबे भागते हुए एनकाऊंटर में मारा जायेगा। ठीक वैसा हीं हुआ। आज भागते हुए अपराधी मारा गया। वैसे जब कुत्ते को भागना हीं था तो सरेंडर क्यों किया ? सरकार को यह नोट कर लेना चाहिए कि अब कानून, संविधान की कोई आवश्यकता देश में रही नहीं। इसलिए कानूनी प्राविधान को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए!
आज जिस विकास दूबे को उत्तर प्रदेश की पुलिस अदालत तक नहीं पहुंचा सकती। उससे आप उम्मीद करते हैं कि वो आपको जिन्हें लायक सुरक्षित माहौल मुहैय्या करवायेगी‌ तो आप मूर्ख हीं नहीं महामूर्ख हैं। विकास दूबे तो मारा गया लेकिन जो नेता, वर्दीधारी, विधायक उसकी उसकी चाकरी करते थे। उनका खात्मा कब होगा ? विकास को मारकर पुलिस का इकबाल पहले से और कम हो गया है। जनता को खुश करने के लिए भले हीं इस तरह के अन्याय भरे फैसले लिए गए हों पर संविधान और न्याय प्रणाली के अनुसार पूरी तरह से गलत है। 
विकास दूबे को उसके किए की सजा निश्चित तौर पर मिलना चाहिए था। लेकिन न्याय के‌ दायरे में। आज पुलिस के इस बात पर किसी को भी यकीन नहीं हो रहा है कि गाड़ी पलटने के बाद वो पिस्टल छोड़कर भागने की कोशिश किया। जिसमें पुलिस की तरफ से जबाबी हुई और विकास मारा गया। विकास के मारे जाने के बाद पुलिस पर कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जिनकी जानकारी सरकार ‌‌‌‌‌जनता से साझा करें।
पुलिस इनकाउंटर पर उठते कुछ गंभीर सवाल -
जो पुलिस के लोग रिश्र्वत लेते थे उनसे विकास का सामना क्यों नहीं करवाया गया ?
जो अपराधी खुद से आत्मसमर्पण किया हो, वो क्यों भागेगा ?
7 दिन तक वो किस प्रभावशाली ब्यक्ति के सम्पर्क में रहा और पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई, अब उसका सच देश की जनता के सामने कैसे आयेगा ?
जिस गाड़ी में वो उज्जैन से आ रहा था उस गाड़ी को क्यों बदला गया ? 
पुलिस वैन के साथ चल रहे मीडिया के लोगों को इनकाउंटर वाली जगह से 20 किलोमीटर पहले क्यों रोका गया ? 
5 लाख के ईनामी दुर्दांत अपराधी के हाथ पुलिस वैन में खुले हुए क्यों थे ? 
उसे गिरफ्तार करने के बाद पुलिस द्वारा उसे हथकड़ीयां क्यों नहीं लगाई गई थी ? 
क्रेन से गाड़ी को गिरे हुए साइड से रगड़ते हुए पुलिस ने क्यों खिंचवाया ? 
आखिरकार सरकार किसे बचाना चाह रही है ?

Thursday, July 9, 2020

विकास दूबे उज्जैन में गिरफ्तार हुआ या प्रायोजित समर्पण किया

सुबह 10 बजे के करीब आज तक खबरी चैनल के माध्यम से एक खबर ब्रेक हुई कि कानपुर में हुए हिंसा जिसमें कि DSP समेत 8 बहादुर पुलिस कर्मी मारे गए थे, उसका मुख्य आरोपी आज 7 वें दिन उज्जैन में महाकाल के दर्शन के बाद पुलिस के सामने समर्पण कर दिया। यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है कि इतना शातिर खूनी कैसे हाई अलर्ट के बाद यूपी से मध्यप्रदेश पहुंच गया ? इसी में साजिश की बू आ रही है कि कैसे एक हाई प्रोफाइल आरोपी प्रदेश की सीमा को लांघते हुए उज्जैन पहुंचा ? वो भी तब जब कल हीं पुलिस और मिडिया के लोग बता रहे थे कि वो फरीदाबाद था तो इतनी जल्दी उज्जैन। बात कुछ समझ नहीं आई।
जब सिस्टम के अन्दर गन्दगी जड़ों तक समा गई हो तो उसका परिणाम विकास दूबे जैसा हीं निकलता है। विकास दूबे के आगे पूरा का पूरा पुलिस थाना नतमस्तक हुआ करता था। जिन 8 पुलिस के जवानों को मारा गया उसमें भी पुलिस के लोगों की हीं मिलीभगत थी। लगता है कि विकास दूबे का सरेंडर एक तरह से प्रायोजित था। सरेंडर के बारे में मैं कुछ ज्यादा नहीं लिखूंगा। उसे आप लोग आज पूरे दिन से देख रहे होंगे। लेकिन वोट देते समय अब जरूर सोचिएगा। 

Monday, July 6, 2020

सावन में मठ, मन्दिर बंद होने से मठ, मन्दिरों पर निर्भर लोग बेहाल

सभी देशवासियों को सावन मास की हार्दिक शुभकामना। मा. मुख्यमंत्री जी मैं आपके संज्ञान में लाना चाहता हूं कि मठ, मन्दिरों को बन्द करते समय आपको उससे जुड़े लोगों की आजीविका के बारे में भी विचार करना चाहिए। लाकडाउन जैसी वैश्विक समस्या के साथ जूझते हुए लोग सावन मास में प्रसाद, फूल-मालाएं, खिलौने इत्यादि बेचकर अपना पेट पालने की जुगत में लगे थे। अचानक उन मजबूर और बेबस लोगों के पास मंदिर प्रशासन की तरफ से सूचना आई कि पूरे सावन मास तक मठ, मन्दिर बंद रहेगा। जिसे सुनकर उन्हें बहुत दुःख से गुजरना पड़ रहा है। मेरा सुझाव ये है कि सोमवार और तेरस को छोड़कर गांव के मन्दिरों को यदि कुछ सावधानियों के साथ खोल भी दिया जाय तो आपकी प्रिय जनता के लिए बहुत राहत मिल जाएगी। मैं जौनपुर जिले का निवासी हूं। मैं गांव में हीं हूं, तो मंदिर से जुड़े लोगों की परेशानियों को नजदीक से देख और समझ पा रहा हूं।

मैं अपने क्षेत्र के मन्दिर त्रिलोचन महादेव की हीं बात कर लेता हूं। जिसमें पण्डा, पुजारी, माली, बनिया समुदाय से जुड़े लोगों की संख्या तीन से चार सौ की है। लेकिन एक महीने तक के लिए मन्दिर बंद होने से सबकी आजीविका को खतरा उत्पन्न हो गया है। सब परेशान हैं कि अब धान की खेती कैसे होगी ? मन्दिर पर निर्भर लोगों से बात करो तो यही हर साल जब मन्दिर चलता था तो हम लोग लोग अपना सारा काम (खेती-बाड़ी से लेकर अन्य कार्य) मन्दिर पर हुई कमाई से कर लेते थे। जो कि इस साल संभव नहीं दिख रहा है। मुख्य रूप से मन्दिर पर ये लोग लड्डू, लाचीदाना, नारियल, अगरबत्ती, फूल-माला, बेलपत्र, खिलौना, छोला, समोसा, चाय-पान का धन्धा करते थे। जिनमें मैं कुछ नामों का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं। जो कुछ इस तरह हैं बृजलाल गिरि, प्रशान्त गिरि, दिनेश गिरि, मनोज गिरि, उमेश गिरि, महाबीर गिरि, लौटू गिरि, गुलाब सेठ, धिरेन्द्र गिरि, अमित गिरि, काशी गिरि, रूक्मीना, विकास अग्रहरि, गोपाल अग्रहरि, जयहिंद माली, नखड़ू माली, राजनाथ गिरि, रमेश गिरि, पारस साधु, प्रमोद माली, दरोगा माली, अरविंद प्रजापति, इत्यादि और लोग भी हैं। ये सभी लाकडाउन के शिकार शुरूआती दिनों से हीं हैं। अब इनका ख्याल या तो हमारे आराध्य शिव जी रखें या हमारे मत द्वारा चुनी हुई सरकार रखें। सरकार और पार्टी से उपर उठकर इनके बारे में सोचने की आवश्यकता है।

हर हर महादेव

Friday, July 3, 2020

यू पी के रामराज्य में आज रात एक डीएसपी समेत आठ जवान शहीद

आज सुबह जैसे हीं आंख खुली हमेशा की भांति देश-प्रदेश का हाल जानने के लिए मोबाईल हाथ उठाया और ट्विटर को खोला। ट्विटर खोलते हीं जो पहली खबर आंखों के सामने आई सहसा उस पर यकीन हीं नहीं हुआ। फिर धैर्य के साथ पढ़ा एवं कुछ और पत्तलकार भाईयों के अकाउंट को चेक किया तो उन सबमें एक घटना कामन थी और वो थी कानपुर एनकाऊंटर की घटना। सबसे पहले मैं उत्तर प्रदेश के शहीद पुलिस के जवानों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि भेंट करता हूं तथा आशा करता हूं कि इनके हत्यारे को पुलिस पाताल से निकालकर यमलोक की सैर करायेगी। हमें हमारे पुलिस के जवानों की क्षमता पर पूरा विश्वास है।
यह एनकाउंटर आज प्रसाशन और सरकार पर बहुत से सवाल खड़े कर रही है कि इतनी बड़ी घटना को एक अपराधी कैसे अन्जाम दे दिया ? सवाल ये भी उठता है कि कहीं पुलिस के बीच से हीं किसी की अपराधी विकास दूबे के साथ मिलीभगत तो नहीं थी ? ऐसे अनेकों सवाल प्रदेश के हर नागरिक के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है कि आखिरकार इन शहीदों की शहादत के लिए कौन जिम्मेदार है ? जैसा कि खबर निकलकर आ रही है कि अपराधी विकास दूबे पर 50 से ज्यादा गंभीर मुकदमे प्रदेश में दर्ज है। फिर भी वो बेल्लौस होकर बाहर घूमता रहा और आज उसकी हिमाकत तो देखिए वो पुलिस वालों पर हीं कहर बनकर टूट गया। आखिर एक अपराधी में इतनी ताकत आती कहां से है ? यह सवाल भी उठना चाहिए और एक निर्णायक स्तर पर जाकर रूकना चाहिए। हम पुलिस को दोष देते हैं लेकिन ये क्यों नहीं समझते हैं कि वो किसी सत्ता, सरकार के अधीन हैं। और उस सरकार के अंग विकास दूबे जैसे कई गंभीर धाराओं वाले अपराधी भी हैं। सत्ता का वो रंग है जहां लोग अपने-अपने तरीके से अपने को अपराध मुक्त करवाते हैं और कहते हैं कि ये मुकदमे राजनीतिक प्रतिशोध के माध्यम से करवाया गया था। लेकिन सच जो है वो हर शख्स को पता होता है।
आज हम विभिन्न तरीकों से इन शहीद पुलिस के जवानों को श्रद्धांजलि देंगे और अपराधी को कोसेंगे, सत्ता को कोसेंगे लेकिन कल से हम फिर किसी विकास जैसे पागलों का गुणगान गाना शुरू कर देंगे। हमें सिस्टम को मजबूत और पारदर्शी बनाने के लिए एक लम्बे संघर्ष की आवश्यकता है, बिना संघर्ष के 'ढाक के तीन पात' वाली कहानी चरितार्थ होगी।
पुलिस के शहीद वीर जवानों को सिर झुकाकर नमन !