Friday, December 7, 2018

चुनाव और भाषा की गिरती मर्यादा

वैसे तो देखा गया है कि 2013 से चुनावी भाषणों में भाषा की मर्यादा को तोडना शुरू कर दिया गया था, परन्तु अब तो भाषा भी शरमा जाये जैसी उसकी मजम्मत की जा रही है, हमारे देश में गाय,गोबर,हिन्दू-मुसलमान का ज्यादा ऊँचा ओहदा हो गया है बनस्पति शिक्षा,स्वास्थ्य,रोटी-रोजगार,सड़क,बिजली और पानी के. हमारे देश के सारे नेता चीखते है चिल्लाते है मानो उनके हाथ में कोई अलादीन का चिराग है जैसे वो आदेश देंगे और सारी समस्याओं का हल निकल जायेगा परन्तु हद तो तब होती है जब ये लोग सत्ता में आते है और उन सभी मुद्दों से अपना ध्यान हटा कर गाय,गोबर और गंगा पर लगा देते है और अगर इनसे थोड़ा वक्त मिलता है तो थोड़ा ध्यान दंगा पर लगा देते हैं.
हमारे देश में बेगारी आज राष्ट्रिय समस्या के तौर पर स्थापित हो चुकी है परन्तु  ये कहते है कि उन्होंने 60 साल कुछ नहीं किया और वो कहते जहाँ-जहाँ आप 15 साल 20 साल से हैं वहाँ आपने क्यों नहीं किया, तो मेरे ख्याल से इस तरह की बाते दोनों बड़ी राजनितिक पार्टियां अपनी कमियों को छुपाने के लिए करती है सिवाय सच्चाई को आत्मसात करने की. जब कोई सामाजिक ब्यक्ति या पत्रकार सरकार से सवाल करते है तो उन्हें डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है या उनसे उल्टे सवाल पूछ लिया जाता है कि क्या आप चाहते हैं कि गाय की सुरक्षा नहीं की जानी चाहिए आप देशद्रोही है आप हिन्दू-विरोधी है आप को इस देश में रहने का कोई हक नहीं है आप पाकिस्तान चले जाओ और इन मामलों को बदलने में सत्ताधारी पार्टी का एक प्रवक्ता संबित पात्रा एक जोकर की भांति अपने चरित्र का चित्रण करता है.
आज देश में राष्ट्रिय मुद्दों के ऊपर गाय और गोबर शिक्षा के ऊपर दीक्षा, सच के ऊपर झूठ,प्रजातंत्र के ऊपर भीड़ तंत्र को हावी किया जा रहा है उसका उदहारण चार दिन पहले भी हम सबने बुलंदशहर में देखा जिसमें एक बहादुर  दरोगा की निर्मम हत्या कर दी जाती है और सत्ताधारी दल के नेता,विधायक ,सांसद शहीद दरोगा को भ्रष्ट और एक पंथ को लेकर नरम रवैया अपनाने का आरोप लगते हुए भीड़तंत्र द्वारा किये गए घृणित कार्य को जायज ठहरने की भरपूर कोशिश कर रहे है. कुछ हिंदूवादी संगठन विहिप, बजरंग दल के लोगों का भी नाम आ रहा है और इस संगठन के लोग भी भीड़ द्वारा फैलाई गयी हिंसा को जायज ठहरा रहे है, ये क्या हो गया है हमारे देश के लोगों को उन्हें अपने भविष्य की काली छाय क्यों नहीं दिखाई दे रही है या अब हम इसे मान ले कि यह दौर हिंदुत्व का स्वर्णिम दौर है.         

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