झूठ की पराकाष्ठा ऐसी की झूठ भी शरमा कर बेहोश हो धरती पर गिरकर मूर्छित अवस्था में पड़ जाय ऐसे-ऐसे झूठ वीर आज हमारे देश में मौजूद है उनके जैसे झूठे हजारों साल के इतिहास में कभी नहीं पैदा नहीं हुए,मैं किसी का नाम नहीं लूँगा आप लोग ये मत कहना कि मैं नरेंद्र भाई मोदी के बारे में कह रहा हूँ भाई उनके बारे में ऐसा कुछ बोलने की गुस्ताखी मैं भूलकर भी नहीं कर सकता क्योंकि नरेंद्र भाई मोदी तो सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से भी बड़े हैं बेशक दोनों अपने-अपने ब्यक्तित्व में महान रहें है एक सत्यवादिता के लिए तो दुसरे झूठवादिता के लिए.
सुभाष के साथ देश की आजादी के लिए लड़े इन सैनिकों को बचाने के लिए देश के भावी प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने वह काला कोट वकीलों वाला फिर से अपने शरीर पर धारण करना किया,जिसे वे वकालत के कैरियर की बहुत शुरुआत में छोड़ चुके थे,अगर हम देखना चाहें तो गूगल पर वह अद्भुत तस्वीर मिलेगी,जिसमें नवंबर 1945 में लाल किले में आइएनए सैनिकों का मुकदमा लड़ने के लिए तीन शख्स जा रहे हैं,ये तीन लोग थे,पंडित जवाहरलाल नेहरू,सर तेज बहादुर सप्रू और हमारे समय के सबसे मुखर और चर्चित सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू के दादा कैलाश नाथ काटजू.
मेरे जैसे लाखों-करोंडो लोग सोचते है कि मोदी जी रोज नए-नए ज्ञान कहाँ से लाते हैं,जैसे कि कल हीं उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने देश के लोगों को केवल एक परिवार का बना कर रख दिया और सभी महापुरुषों की उपेक्षा किया गया तो ये मेरे जैसे हजारों और लाखों लोगों के लिए स्तब्ध करने वाला था,इससे एक बात अवश्य सत्यापित होती है कि जिनका अपना कोई इतिहास नहीं होता वो दूसरे के प्रतीकों को कब्जाना चाहता है क्योंकि वो खोखला है समाज में अछूत होता है और अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए आडवाणी को तो छोड़ देता है और गाँधी,अम्बेडकर,बोस को अपना कहता है और सरासर झूठ बोलने पर आमादा रहता है,मैं ऐसे हीं नेहरू जी और मेनन जी केपत्राचार के कुछ अंश को आपके सामने प्रस्तुत करता हूँ जो सीधे-सीधे मोदी जी को झूठा साबित करने के लिए काफी है-
27 अक्टूबर 1945 को मुरादाबाद से पंडित नेहरू द्वारा कृष्णा मेनन जी को लिखे गए पत्र के कुछ अंश-
‘‘आपको पता ही होगा कि कांग्रेस ने आई एन ए के ऑफिसर्स और जवानों के खिलाफ चल रहे कोर्ट मार्शल के मुकदमे के लिए लिए बचाव कमेटी बनाई है. इसमें बहुत से प्रसिद्ध वकील और पूर्व जज जैसे सर तेज बहादुर सप्रू, भूलाभाई देसाई, दलीप सिंह टेकचंद, आसफ अली आदि शामिल हैं. मैं और रघुनंदन शरण भी इस कमेटी के सदस्य हैं. 5 नवंबर से दिल्ली के लाल किले में तीन ऑफिसर्स शाहनवाज, सहगल और ढिल्लों का मुकदमा शुरू होना है. उसके बाद दूसरे मुकदमे भी शुरू होंगे. सहगल, चेतराम सहगल के बेटे हैं जो कि लाहौर हाईकोर्ट के जज हैं. बाकी दोनों भी पंजाब के जाने माने फौजी परिवारों के लड़के हैं.
मैं वह पहला शख्स था, जिसने आईएनए का मामला उठाया. उसके बाद से इस मामले में दिलचस्पी बढ़ गई और आज यह देश के सामने मौजूद प्रमुख मुद्दों में से एक है. इस मामले में जनता की दिलचस्पी और उत्साह को देखते हुए कांग्रेस के पीछे-पीछे मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और सिख लीग भी शामिल हो गए हैं. लेकिन हमेशा की तरह कोई भी काम करने की जिम्मेदारी कांग्रेस की ही है. यह एक बड़ा काम है और महज कानूनी बचाव पक्ष होने से कहीं बड़ा है. इससे पहले मैंने शायद ही किसी सवाल को इस तेजी शिद्दत से लोगों के दिमाग में घर करते देखा हो. दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में जितनी दिलचस्पी भारत के नागरिकों की है, उतनी ही दिलचस्पी भारतीय सेना की भी है. मेरे पास इस बात के ढेरों सबूत हैं.
मैं समझता हूं कि रघुनंदन शरण ने जरूरी कागजात पहले ही आपको भेज दिया होंगे और बाकी कागजात वह भेज रहे होंगे. आईएनए के ऑफिसर और जवान बहुत बढ़िया सैनिक हैं. वह बहादुर हैं, मजबूत जिगर के हैं, उनमें क्षमता है और उनमें बहुत अच्छी राजनीतिक चेतना है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह अपने निजी जीवन की पर्वाह नहीं करते. वे सभी संप्रदाय और धर्मों के लोग हैं. इस पूरे मामले में जटिल अंतरराष्ट्रीय कानून परिदृश्य में आते हैं और इस सब के पीछे भारत, मलाया और वर्मा में हुए नाटकीय घटनाक्रम हैं. इन्हीं घटनाक्रम के चलते आईएनए की स्थापना हुई थी. उन्होंने खुद को एक स्वतंत्र फौज की हैसियत से रखा और जापानियों के नियंत्रण में आने से इनकार कर दिया.
3 नवंबर 1945 को कृष्णा मेनन को पंडित नेहरू जी ने पत्र लिखा-
‘‘मैं एक महत्वपूर्ण मुद्दे के सिलसिले में तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूं, यह मुद्दा 5 नवंबर से आइएनए का मुकदमे शुरू होने का है.मैं समझता हूं कि तुम्हें पता ही होगा की 21 अक्टूबर 1945 को सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की प्रोविजनल गवर्मेंट का स्थापना की गई थी और सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्राध्यक्ष माना गया था. जापान, जर्मनी, इटली, श्याम, नानकिंग,मानचूकूओ,फिलीपींस आदि ने इस सरकार को मान्यता दी थी. जापान के साथ राजनयिकों का आदान प्रदान हुआ और दूसरे देशों से भी शुभकामना संदेश मिले.’’
4 जनवरी 1946 को कमांडर इन चीफ ने शाहनवाज,सहगल और ढिल्लों को कोर्ट मार्शल में सुनाई गई मौत की सजा को वापस ले लिया. उनके जप्त किए गए एरियर अलाउंस भी वापस देने की घोषणा कर दी गई.
5 जनवरी को लरकाना में प्रेस को दिए इंटरव्यू में पंडित नेहरू ने कहा-
‘‘मैं आईएनए के इन तीन अफसरों की रिहाई से बहुत खुश हूं. वरिष्ठ अधिवक्ता भूलाभाई देसाई ने बहुत ही योग्यता और करीने से यह मुकदमा लड़ा, वह बधाई के पात्र हैं. इस मामले में भारत के लोग पहले से कहीं ज्यादा एकजुट दिखाई दिए. इसलिए यह उनकी जीत है. हम अपने साथियों शाहनवाज, ढिल्लों और सहगल का स्वागत करते हैं और उनकी देशभक्ति साहस और क्षमता का भरोसा करते हैं, जिसने बड़े कठिन इंतिहान दिए हैं. अब उनकी क्षमताएं भारत के निर्माण में लगाई जाएंगीं.
इतने पत्रों को पढ़कर और उसके सन्दर्भों को जो न समझ पाए तो ऐसे लोगों के लिए भक्त की संज्ञा दे देनी चाहिए और उन्हें आपत्ति भी नहीं होगी.
जय हिन्द जय सुभाष
BJP/RSS History ko redefine krne ki unsuccessful koshish kr rhi hai
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